RBI की इस मास्टरस्ट्रोक स्कीम से बाजार में बरसे डॉलर, 11 साल पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त

भारतीय बैंकिंग सेक्टर से इस वक्त की सबसे बड़ी वित्तीय खबर सामने आ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की डॉलर-रुपया स्वैप स्कीम (Swap Scheme) ने देश के विदेशी मुद्रा बाजार में एक नया इतिहास रच दिया है। देश के कमर्शियल बैंकों ने इस स्कीम का आक्रामक तरीके से फायदा उठाते हुए महज दो महीने के भीतर 41 अरब डॉलर (करीब 3.4 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम विदेशी फंड जुटा लिया है। इसके साथ ही साल 2013 में बने 11 साल पुराने रिकॉर्ड को भी मटियामेट कर दिया है।

क्या थी 2013 की चुनौती और कैसे टूटा वो रिकॉर्ड?

साल 2013 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था ‘टैपर टेंट्रम’ (Taper Tantrum) और रुपये के अवमूल्यन के गंभीर संकट से जूझ रही थी, तब तत्कालीन आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों के लिए एक विशेष स्वैप विंडो खोली थी। उस दौरान बैंकों ने विदेशी मुद्रा अनिवासी (FCNR-B) खातों के जरिए लगभग 34 अरब डॉलर जुटाए थे। लेकिन इस बार, बैंकों ने बिना किसी बड़े संकट के, महज 60 दिनों के भीतर 41 अरब डॉलर जुटाकर उस ऐतिहासिक आंकड़े को बहुत पीछे छोड़ दिया है।

बैंकों ने क्यों दिखाई इतनी दिलचस्पी?

बाजार विश्लेषकों के मुताबिक, इस भारी-भरकम फंड जुटाने के पीछे आरबीआई की आकर्षक स्वैप दरें और घरेलू बाजार में लिक्विडिटी (नकदी) की बढ़ती मांग है।

  • सस्ता फंड: बैंकों को इस स्कीम के तहत ग्लोबल मार्केट से बेहद प्रतिस्पर्धी दरों पर डॉलर मिल गए।

  • रुपये की मजबूती: आरबीआई ने इस कदम से न सिर्फ बैंकों को नकदी दी, बल्कि रुपये की विनिमय दर को भी एक मजबूत सहारा दिया।

  • क्रेडिट ग्रोथ: भारत में लोन की मांग (Credit Demand) लगातार बढ़ रही है, जिसे पूरा करने के लिए बैंकों को इस अतिरिक्त पूंजी की सख्त जरूरत थी।

भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्वैप स्कीम की सफलता से भारतीय बैंकिंग सिस्टम की वैश्विक साख और मजबूत हुई है। जब बैंकों के पास पर्याप्त विदेशी और घरेलू फंड होगा, तो वे उद्योगों और आम उपभोक्ताओं को बेहतर दरों पर लोन देने में सक्षम होंगे। इसके अलावा, विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को भी इससे अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती मिलेगी, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय बाजार को एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।