
शेयर बाजार में निवेश करने वाले हर व्यक्ति के मन में अक्सर यह सवाल जरूर आता है कि आखिर क्यों विदेशी बाजारों की मामूली हलचल या स्थानीय मुद्रा में थोड़ा सा उतार-चढ़ाव हमारे पोर्टफोलियो को सीधे तौर पर हिला कर रख देता है। जब भी आप बाजार में तेजी या मंदी की खबरें देखते हैं, तो उसमें क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल के दाम, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और भारतीय रुपये की चाल का जिक्र सबसे पहले किया जाता है। यदि आप भी यह समझना चाहते हैं कि ये तीनों बड़े आर्थिक कारक शेयर बाजार के राजा क्यों माने जाते हैं और इनका सीधा असर आपकी गाढ़ी कमाई पर कैसे पड़ता है, तो इसके पीछे की पूरी और रोचक कहानी को विस्तार से जानना जरूरी है।
कच्चा तेल कैसे तय करता है देश की अर्थव्यवस्था की चाल
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात यानी इम्पोर्ट करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब भी कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल आता है, तो देश का आयात बिल सीधे तौर पर बढ़ जाता है। तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है, जिससे देश में महंगाई बढ़ने लगती है। जब महंगाई बढ़ती है तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाता है, जिसका सीधा असर शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों के मुनाफे और निवेशकों के सेंटीमेंट पर पड़ता है। यही वजह है कि कच्चे तेल का एक-एक डॉलर का उतार-चढ़ाव निवेशकों की नींद उड़ा देता है।
डॉलर और रुपये की जंग का बाजार पर असर
कच्चे तेल के साथ-साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कमजोरी या मजबूती भी शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती है। चूंकि भारत तेल और कई जरूरी कच्चे माल का भुगतान डॉलर में करता है, इसलिए यदि डॉलर मजबूत होता है और रुपया कमजोर पड़ता है, तो आयातकों को विदेशों से सामान खरीदने के लिए अधिक रुपये चुकाने पड़ते हैं। इसके विपरीत, आईटी और फार्मा जैसी कंपनियां जो अपना सामान विदेशों में बेचती हैं (एक्सपोर्ट करती हैं), उन्हें रुपये के कमजोर होने पर फायदा भी मिलता है। लेकिन कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था के लिए रुपये का कमजोर होना आयात महंगा होने का संकेत देता है, जिससे विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की ओर भागने लगते हैं और शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिलती है।
वैश्विक बाजार की हलचल और निवेशकों के लिए जरूरी सीख
शेयर बाजार कोई ऐसी बंद कोठरी नहीं है जो केवल देश के अंदरूनी हालातों पर चले, बल्कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। अमेरिका में ब्याज दरों में बदलाव, मिडिल ईस्ट या अन्य हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर इंडेक्स की चाल और कच्चे तेल के ग्लोबल भंडार जैसे तमाम कारक मिलकर घरेलू बाजार की चाल को नियंत्रित करते हैं। ऐसे में किसी भी समझदार निवेशक के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह केवल कंपनियों के फंडामेंटल्स ही नहीं, बल्कि इन वैश्विक मैक्रो-इकोनॉमिक्स इंडिकेटर्स पर भी पैनी नजर रखे। जब आप इन आर्थिक समीकरणों को समझ जाते हैं, तो बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान घबराने के बजाय सही समय पर सटीक निवेश निर्णय ले सकते हैं।
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