
उत्तर प्रदेश में साल 2027 में होने वाले महामुकाबले यानी विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जहां एक तरफ सत्ता में वापसी के लिए नए समीकरण साध रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी का अतीत उनका पीछा छोड़ता नजर नहीं आ रहा है। पिता मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल तक लिए गए कुछ ऐसे ऐतिहासिक और विवादित फैसले रहे हैं, जिन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हर चुनाव में बड़ा हथियार बनाती है। आगामी चुनाव में भी ये मुद्दे एक बार फिर सपा के लिए गले की फांस बन सकते हैं और बीजेपी के चुनावी नैरेटिव को धार दे सकते हैं।
बाप-बेटे के वो 5 बड़े फैसले: जो आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बन जाते हैं बड़ा टर्निंग पॉइंट
सियासी पंडितों के अनुसार, सपा के इतिहास के पांच बड़े फैसले आज भी जनता के बीच बहस का विषय बनते हैं। पहला, मुलायम सिंह के दौर में कानून-व्यवस्था को लेकर लिए गए कुछ फैसले और कथित तौर पर माफिया तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने के आरोप, जिसे बीजेपी सीधे ‘जंगलराज’ से जोड़ती है। दूसरा, साल 2012 से 2017 के बीच अखिलेश सरकार के दौरान हुए कुछ बड़े सांप्रदायिक तनाव और दंगों से निपटने की प्रशासनिक नीति। तीसरा, पार्टी के भीतर का पुराना पारिवारिक कलह, जिसने जनता में यह संदेश दिया कि नेतृत्व में बिखराव है। चौथा, टिकट बंटवारे के समय कुछ खास समुदायों को अत्यधिक तवज्जो देने की नीति, जिससे गैर-यादव ओबीसी और सवर्ण वोटर छिटक गए। और पांचवां, पूर्व में विपक्षी दलों के साथ किए गए कुछ ऐसे गठबंधन जो चुनाव के तुरंत बाद ताश के पत्तों की तरह बिखर गए, जिससे सपा की राजनीतिक स्थिरता पर सवाल उठे।
बीजेपी का चक्रव्यूह और आधुनिक रणनीति: एआई और डिजिटल डेटा के दौर में पुरानी फाइलों को खंगालने की तैयारी
आधुनिक चुनावी प्रबंधन और Generative AI आधारित कैंपेनिंग के इस दौर में इतिहास के पन्नों को भुनाना बेहद आसान हो गया है। भारतीय जनता पार्टी का थिंक टैंक इन पांचों फैसलों से जुड़ी पुरानी वीडियो क्लिपिंग्स, बयानों और प्रशासनिक रिकॉर्ड्स का एक पूरा डिजिटल डेटाबेस तैयार कर रहा है। इसे सोशल मीडिया और बूथ स्तर के व्हाट्सएप ग्रुप्स के माध्यम से सीधे वोटरों तक पहुंचाया जाएगा। इस काउंटर-स्ट्रेटजी का मुख्य उद्देश्य युवा वोटरों को, जिन्होंने वह दौर नहीं देखा है, सपा के पुराने शासनकाल की याद दिलाना है। ऐसे में अखिलेश यादव के लिए चुनौती सिर्फ नए वादे करने की नहीं, बल्कि अपने अतीत के दागों को धोने की भी होगी।
लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में गरमाई बहस: सपा मुख्यालय से लेकर विधानसभा तक नई रणनीति पर मंथन
उत्तर प्रदेश की सत्ता के केंद्र लखनऊ के हजरतगंज और मॉल एवेन्यू स्थित सपा मुख्यालय के आसपास इन दिनों इस संभावित खतरे को लेकर गंभीर चर्चाएं चल रही हैं। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि अखिलेश यादव इस बात को अच्छी तरह भांप चुके हैं कि बीजेपी उन्हें अतीत के चक्रव्यूह में घेरने की कोशिश करेगी। यही वजह है कि वे अब सॉफ्ट हिंदुत्व, विकास के नए दावों और पूरी तरह से बदले हुए प्रो-एक्टिव अंदाज में जनता के बीच जा रहे हैं। लखनऊ सहित पूरे सूबे के युवाओं को आकर्षित करने के लिए सपा अपनी एक नई और साफ-सुथरी छवि पेश कर रही है, ताकि विरोधियों के पास उनके अतीत को कुरेदने का कोई ठोस मौका न बचे।
girls globe