
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाता है, तो बंटवारे के जख्म और सीमा विवादों की चर्चा हमेशा सुर्खियों में रहती है। हाल ही में एक बार फिर राजनीतिक और रणनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यदि 1947 में भारत ने बलूचिस्तान को लेकर अलग रुख अपनाया होता, तो आज तस्वीर कुछ और होती? क्या आज बलूचिस्तान भारत का हिस्सा होता और पाकिस्तान अपनी भौगोलिक सीमाओं के भीतर रहने को मजबूर होता? विशेषज्ञों और इतिहासकारों के बीच छिड़ी इस बहस ने ‘ग्वादर पोर्ट’ और ‘भारत-पाकिस्तान संबंध’ के पूरे नैरेटिव को नए सिरे से खड़ा कर दिया है।
बलूचिस्तान और 1947 की भू-राजनीतिक बिसात
1947 के दौरान बलूचिस्तान का मुद्दा काफी पेचीदा था। उस समय बलूचिस्तान के खान ने भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र अस्तित्व की इच्छा जताई थी। रणनीतिकारों का मानना है कि यदि उस वक्त की भारतीय नेतृत्व ने बलूचिस्तान के भारत के साथ विलय को लेकर अधिक सक्रियता दिखाई होती, तो स्थिति आज बेहद अलग हो सकती थी। बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति इसे अरब सागर के मुहाने पर खड़ा करती है, जो सुरक्षा और व्यापार के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जानकारों का कहना है कि अगर बलूचिस्तान भारत के पास होता, तो आज ग्वादर बंदरगाह पर तिरंगा लहरा रहा होता, जो भारत की समुद्री शक्ति और आर्थिक पहुंच को कई गुना बढ़ा देता।
पाकिस्तान के लिए क्यों है बलूचिस्तान का दर्द?
पाकिस्तान आज जिस तरह से बलूचिस्तान में आंतरिक विद्रोह और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से जूझ रहा है, उसे इतिहासकार इसी ऐतिहासिक भूल की कड़ियों से जोड़कर देखते हैं। पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान केवल एक प्रांत नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक कमजोरी भी है। बलूचिस्तान के लोग लंबे समय से अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों की मांग करते रहे हैं। यदि बलूचिस्तान का विलय भारत के साथ हुआ होता, तो भारत की सीमाएं सीधे ईरान और अफगानिस्तान के साथ जुड़तीं, जिससे दक्षिण एशिया की पूरी भू-राजनीति ही बदल जाती और पाकिस्तान का दबदबा काफी सीमित रहता।
ग्वादर पोर्ट और सामरिक महत्व
आज ग्वादर बंदरगाह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का केंद्र है और चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का एक हिस्सा माना जाता है। भारत के रणनीतिक विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि यह क्षेत्र भारत के पास होता, तो हिंद महासागर क्षेत्र में भारत का प्रभाव पूरी तरह से निर्विवाद होता। यह न केवल भारत के व्यापारिक रास्तों को सुरक्षित करता, बल्कि अरब सागर में भारत की ‘ब्लू वॉटर नेवी’ (Blue Water Navy) की स्थिति को और भी अधिक आक्रामक और मजबूत बनाता। बलूचिस्तान का होना भारत के लिए किसी गेम-चेंजर से कम नहीं होता।
इतिहास के पन्नों पर उठते सवाल
नेहरू युग के फैसलों पर यह बहस अक्सर उठती रही है कि उस समय भारत ने किन परिस्थितियों में बलूचिस्तान पर अपना दावा नहीं जताया। हालांकि, उस समय भारत का पूरा ध्यान विभाजन की विभीषिका, सांप्रदायिक दंगों को रोकने और रियासतों के एकीकरण पर था। बावजूद इसके, आज जब पाकिस्तान लगातार भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश करता है, तो यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या बलूचिस्तान के मुद्दे पर भारत की उस समय की ‘हिम्मत’ पाकिस्तान को उसकी औकात में रखने के लिए काफी होती? यह सवाल आज भी एक कूटनीतिक पहेली बना हुआ है, जिस पर भविष्य के इतिहासकार ही मुहर लगा सकते हैं।
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