Supreme Court Judgement: सुप्रीम कोर्ट ने जिसे 45 साल बाद कहा बेगुनाह, वो जेल में काट चुका पूरी उम्रकैद; 3 लोग मर तक गए

‘देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है’ (Justice delayed is justice denied)—यह कहावत उत्तर प्रदेश के 49 साल पुराने एक हाई-प्रोफाइल मर्डर केस में पूरी तरह सच साबित हुई है। देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने साल 1977 के एक चर्चित हत्याकांड में 45 साल के लंबे कानूनी संघर्ष के बाद तीन जीवित आरोपियों को पूरी तरह बेगुनाह करार देते हुए बरी कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की पूरी जांच थ्योरी और कथित चश्मदीदों के बयानों को सिरे से खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत का यह ऐतिहासिक फैसला तब आया जब एक मुख्य आरोपी ‘हीरा लाल’ बेगुनाह होने के बावजूद जेल की सलाखों के पीछे अपनी उम्रकैद की पूरी सजा काट चुका था। न्याय की यह जीत व्यवस्था की सुस्ती के कारण बेहद फीकी और झकझोर देने वाली साबित हुई है।

1977 का उत्तर प्रदेश मर्डर केस: आधी सदी के कानूनी संघर्ष में दम तोड़ गए 3 आरोपी

इस बेहद दर्दनाक और पेचीदा मामले की शुरुआत 28 जून 1977 को उत्तर प्रदेश में हुई एक जघन्य हत्या की वारदात से हुई थी। स्थानीय पुलिस की चार्जशीट के आधार पर साल 1981 में ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) ने सभी आरोपियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद (Life Imprisonment) की सख्त सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से भी उन्हें निराशा हाथ लगी और हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा। इस आधी सदी के लंबे कानूनी ड्रामे के दौरान मामले से जुड़े कुल आरोपियों में से दो की सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही मौत हो गई। बाकी बचे जीवित तीन आरोपियों में से दो को तो साल 2013 में सर्वोच्च अदालत से जमानत मिल गई थी, लेकिन बदकिस्मती से हीरा लाल की जमानत याचिका तकनीकी आधार पर खारिज कर दी गई थी। नतीजतन, बेगुनाह हीरा लाल को सालों तक जेल में तड़पना पड़ा और अंततः यूपी सरकार द्वारा सजा माफी की नीति के तहत ही वह जेल से बाहर आ सका।

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: पुलिस की कहानी मनगढ़ंत, चश्मदीदों की गवाही पर उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट के माननीय जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए पुलिस और सरकारी वकीलों की दलीलों में कई गंभीर खामियां और विरोधाभास पकड़े। सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि पुलिस ने जिस चश्मदीद गवाही के दम पर यह केस तैयार किया था, वह पूरी तरह अविश्वसनीय है। कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को बेहद ठोस माना कि मर्डर की घटना उस तरीके से बिल्कुल नहीं हुई थी जैसा कि पुलिस ने अपनी एफआईआर (FIR) और जांच रिपोर्ट में दर्शाया था। खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने ही पुलिस की इस मनगढ़ंत थ्योरी को आंख मूंदकर स्वीकार करने की भारी न्यायिक चूक की थी।

‘घटनास्थल पर गवाहों की मौजूदगी असंभव’: निचली अदालत और हाईकोर्ट के रवैये पर खिंचाई

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है कि यह वारदात 28 जून 1977 की दोपहर को ठीक उसी प्रकार हुई थी जैसा दावा किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि कथित चश्मदीद गवाहों की घटनास्थल पर मौजूदगी न सिर्फ संदिग्ध है बल्कि भौगोलिक और व्यावहारिक रूप से बेहद असंभव प्रतीत होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सबूत इतने कमजोर और अविश्वसनीय हों, तो आरोपियों को सीधे तौर पर ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) मिलना चाहिए था। ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन बुनियादी कानूनी पहलुओं को नजरअंदाज करके निर्दोष लोगों की जिंदगी को नरक बना दिया, जो कि न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।