
भारतीय रेलवे के गौरवशाली इतिहास में 17 जुलाई 2026 का दिन एक बड़े और क्रांतिकारी युग की शुरुआत करने जा रहा है। देश की पहली 100 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक से निर्मित हाइड्रोजन-संचालित ट्रेन (Hydrogen-Powered Train) हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच पटरियों पर दौड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बहुप्रतीक्षित और ऐतिहासिक ट्रेन को वर्चुअली हरी झंडी दिखाकर राष्ट्र को समर्पित करेंगे। यह अभूतपूर्व कदम न केवल भारतीय रेल का कायाकल्प करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर शून्य-कार्बन उत्सर्जन (Net-Zero Carbon Emission) के क्षेत्र में भारत को सबसे अगली कतार में लाकर खड़ा कर देगा।
ट्रेन की मुख्य विशेषताएं और बेजोड़ क्षमता: ICF चेन्नई का एक और नायाब शाहकार
पूरी तरह से ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) मिशन के तहत तैयार की गई इस ग्रीन ट्रेन को चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) के इंजीनियरों ने विकसित किया है। यह ब्रॉड गेज प्लेटफॉर्म पर संचालित होने वाली दुनिया की सबसे लंबी और सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन है। इस आधुनिक ट्रेन की तकनीकी क्षमताएं इस प्रकार हैं:
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विशाल यात्री क्षमता: यह 10 कोच वाली एक डेमू (DEMU) स्टाइल ट्रेन है, जिसमें 682 बैठने की सीटों सहित एक बार में लगभग 2,600 यात्री आसानी से सफर कर सकेंगे।
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पावरफुल इंजन ग्रिड: इस ट्रेन में 1200 kW की दो ड्राइविंग पावर कार (DPC) लगाई गई हैं, जो संयुक्त रूप से इसे 2400 kW की बेजोड़ शक्ति प्रदान करती हैं।
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रफ्तार की सीमा: हालांकि बेहद जटिल और सफल सुरक्षा ट्रायल्स के दौरान इस ट्रेन ने 120 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार दर्ज की थी, लेकिन नियमित वाणिज्यिक संचालन के दौरान यात्रियों की सुरक्षा हेतु इसे 75 किमी प्रति घंटा की नियंत्रित गति से ट्रैक पर दौड़ाया जाएगा।
जींद-सोनीपत रूट और टाइम टेबल: मात्र 5 रुपये में शुरू होगा देश का सबसे हाई-टेक सफर
उत्तर रेलवे के दिल्ली डिवीजन के अंतर्गत आने वाले 89 किलोमीटर लंबे जींद-सोनीपत रेलवे सेक्शन को इस ऐतिहासिक पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया है। स्थानीय यात्रियों को ध्यान में रखते हुए इसका किराया और समय सारणी बेहद आकर्षक रखी गई है:
| यात्रा का विवरण | आधिकारिक जानकारी एवं शेड्यूल |
| ट्रेन नंबर (अप / डाउन) | 74010 (जींद से सोनीपत) / 74009 (सोनीपत से जींद) |
| प्रस्थान का समय | प्रतिदिन सुबह 07:40 बजे (जींद रेलवे स्टेशन से) |
| आगमन का समय | प्रतिदिन सुबह 09:40 बजे (सोनीपत रेलवे स्टेशन) |
| प्रमुख ठहराव (स्टॉपेज) | रास्ते में पांडू पिंडारा और गोहाना सहित 12-13 छोटे स्टेशनों पर हॉल्ट |
| टिकट की दरें (किराया) | आम पैसेंजर ट्रेनों के बराबर (न्यूनतम ₹5 से अधिकतम ₹25 के बीच) |
कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन? प्रदूषण की जगह साइलेंसर से निकलेगा शुद्ध पानी और भाप
पारंपरिक डीजल इंजन जहां भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर और पीएम 2.5 जैसे जहरीले कण वातावरण में छोड़ते हैं, वहीं यह नई ट्रेन ‘हाइड्रोजन फ्यूल सेल’ (Hydrogen Fuel Cell Technology) नामक अत्याधुनिक तकनीक पर काम करती है। ट्रेन की छत पर लगे विशेष फ्यूल सेल के भीतर स्टोर की गई हाइड्रोजन गैस और वायुमंडल की ऑक्सीजन के बीच एक नियंत्रित रासायनिक अभिक्रिया (Chemical Reaction) कराई जाती है। इस प्रक्रिया से सीधे हाई-वोल्टेज बिजली (Electricity) पैदा होती है, जिससे ट्रेन की हैवी-ड्यूटी इलेक्ट्रिक मोटरें काम करती हैं। इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया का सबसे जादुई और शानदार पहलू यह है कि इसमें प्रदूषण के नाम पर धुआं नहीं, बल्कि केवल शुद्ध जल वाष्प (Water Vapor) और हल्की गर्मी ही बाहर निकलती है, जिसे आम भाषा में ‘पानी से चलने वाली ट्रेन’ कहा जा रहा है। ईंधन की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए जींद स्टेशन पर एक स्वदेशी हाइड्रोजन स्टोरेज और हाई-प्रेशर रिफ्यूलिंग प्लांट स्थापित किया गया है, जिसे भारत सरकार के पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) से सुरक्षा अनापत्ति और संचालन की मंजूरी मिल चुकी है।
वैश्विक एलीट क्लब में भारत की एंट्री: जर्मनी, जापान और चीन को मिलेगी सीधी टक्कर
इस बेहद जटिल, महंगी और संवेदनशील तकनीक को सफलतापूर्वक ट्रैक पर उतारते ही भारत ने वैश्विक पटल पर एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। अब भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों के सबसे एलीट क्लब में शामिल हो गया है जिनके पास अपनी सक्रिय हाइड्रोजन रेल तकनीक है:
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जर्मनी: दुनिया की पहली वाणिज्यिक और कमर्शियल हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन लॉन्च करने का गौरव इसके नाम है।
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चीन: एशिया महाद्वीप की पहली शहरी हाइड्रोजन ट्रेन विकसित करने का दावा कर चुका है।
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भारत: ब्रॉड गेज (Broad Gauge) रेल लाइनों के लिए दुनिया की सबसे शक्तिशाली 2400 kW क्षमता की स्वदेशी ट्रेन बनाकर भारत ने अपनी तकनीकी श्रेष्ठता साबित की है।
भविष्य का मेगा प्लान: 2030 तक सभी गैर-विद्युतीकृत रूट्स से हटेंगे पुराने डीजल इंजन
भारतीय रेलवे ने साल 2030 तक खुद को पूर्ण रूप से ‘नेट-जीरो कार्बन एमीटर’ (Net-Zero Carbon Emitter) बनाने का एक बड़ा राष्ट्रीय संकल्प लिया है। जींद-सोनीपत रूट पर शुरू हो रहा यह ऑपरेशन एक शुरुआती टेस्ट बेड है। रेलवे बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस पायलट प्रोजेक्ट के सफल होते ही देश के उन सभी ऐतिहासिक, पहाड़ी और दूरदराज के गैर-विद्युतीकृत रेलवे रूट्स (जैसे दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, कालका-शिमला टॉय ट्रेन, नीलगिरि माउंटेन रेलवे) पर चल रहे पुराने डीजल इंजनों को हमेशा के लिए सेवा से हटा दिया जाएगा। इस मास्टर प्लान से न केवल विदेशों से आने वाले महंगे कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम होगी, बल्कि दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर पटरियों के ऊपर लाखों-करोड़ों की लागत से बिछने वाले बिजली के भारी-भरकम तारों (OHE Lines) का खर्च भी पूरी तरह बच जाएगा।
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