
उत्तर प्रदेश के मेरठ से सामने आए दलित छात्रा मामले ने अब एक बेहद संवेदनशील और बड़ा राजनीतिक रूप अख्तियार कर लिया है। आने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस मुद्दे को लेकर राज्य की सियासत का पारा पूरी तरह गरमा गया है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब धुर विरोधी विचारधारा वाले भाजपा के फायरब्रांड नेता संगीत सोम और बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के सुर एक जैसे नजर आए। वहीं दूसरी तरफ, पीड़ित परिवार ने लखनऊ में समाजवादी पार्टी (SP) के मुखिया अखिलेश यादव से मुलाकात की है। इस पूरे सियासी घमासान के पीछे ‘दलित’ (D Factor) वोट बैंक को साधने की होड़ साफ देखी जा सकती है।
संगीत सोम और मायावती की सियासी जुगलबंदी के मायने क्या हैं
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मेरठ और उसके आस-पास के इलाके हमेशा से बेहद अहम रहे हैं। मेरठ दलित छात्रा मामले को लेकर पूर्व विधायक संगीत सोम ने खुलकर अपनी ही सरकार की पुलिसिंग और प्रशासनिक मुस्तैदी पर सवाल खड़े करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। दिलचस्प बात यह है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए लगभग वैसी ही बातें कही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगीत सोम इसके जरिए जहां पश्चिमी यूपी के ठाकुर और दलित समीकरणों के बीच अपनी जमीन मजबूत कर रहे हैं, वहीं मायावती अपने मूल कैडर को यह संदेश दे रही हैं कि उनकी पार्टी दलित हितों के लिए सबसे मुखर है।
लखनऊ पहुंचे पीड़ित परिजन, अखिलेश यादव ने दिया मदद का भरोसा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पीड़ित दलित छात्रा के परिजनों ने लखनऊ का रुख किया और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से उनके आवास पर मुलाकात की। अखिलेश यादव ने परिवार की आपबीती सुनी और उन्हें हर संभव कानूनी व आर्थिक मदद देने का भरोसा दिलाया। सपा प्रमुख ने इस बहाने उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा राज में बेटियां और दलित समाज सुरक्षित नहीं हैं। सपा की कोशिश इस मामले के जरिए खुद को न्याय की लड़ाई लड़ने वाले सबसे बड़े चेहरे के रूप में पेश करने की है।
चुनाव से पहले क्यों है ‘D’ यानी दलित वोट बैंक पर डबल फोकस
उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता सामाजिक समीकरणों से होकर ही गुजरता है। यही वजह है कि चुनाव से ठीक पहले सभी राजनीतिक दल दलित (D) वोट बैंक पर अपना ध्यान पूरी तरह केंद्रित कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Meerut, Muzaffarnagar, Saharanpur) में दलित मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका में है। भाजपा जहां अपने कैडर को बचाए रखने और डैमेज कंट्रोल में जुटी है, वहीं सपा और बसपा इस वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। मेरठ का यह मामला केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह आगामी चुनावों के लिए एक बड़ा सियासी हथियार बन चुका है।
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