CBSE Big Update: क्या 9वीं क्लास में पढ़नी होगी तीसरी भाषा? जानिए सीबीएसई का नया नियम और पूरी सच्चाई

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के छात्रों और अभिभावकों के बीच इन दिनों नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) के तहत होने वाले बदलावों को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा कन्फ्यूजन कक्षा 9वीं में तीसरी भाषा (Third Language) की अनिवार्यता को लेकर बना हुआ है। सोशल मीडिया से लेकर स्कूल कॉरिडोर तक चर्चा है कि क्या अब हर छात्र को नौवीं कक्षा में तीन भाषाएं पढ़नी होंगी? आइए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई के नए सर्कुलर के आधार पर इस पूरे नियम को आसान भाषा में समझते हैं, ताकि छात्रों और पैरेंट्स का हर डाउट दूर हो सके।

क्या है सीबीएसई का नया थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला और इसके मायने

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत स्कूली शिक्षा के ढांचे में बड़े बदलाव किए जा रहे हैं, जिसमें बहुभाषावाद (Multilingualism) को बढ़ावा देना एक प्रमुख लक्ष्य है। सीबीएसई के नए नियमों के प्रस्ताव के मुताबिक, अब तक जो तीसरी भाषा कक्षा 8वीं तक ही पढ़ाई जाती थी, उसे माध्यमिक स्तर यानी कक्षा 9वीं और 10वीं तक विस्तारित करने की योजना है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं के ज्ञान को भी छात्रों के लिए सुलभ बनाना है, जिससे उनका भाषाई और मानसिक विकास बेहतर तरीके से हो सके।

भाषा के चयन को लेकर क्या हैं शर्तें और विकल्प

सीबीएसई के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि यह नियम पूरी तरह लागू होता है, तो छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा। इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं मूल रूप से भारतीय (Native Indian Languages) होनी अनिवार्य होंगी। उदाहरण के लिए, यदि कोई छात्र पहली भाषा के रूप में अंग्रेजी चुनता है, तो उसे बाकी की दो भाषाओं के रूप में हिंदी, संस्कृत, तमिल, बंगाली या किसी अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषा का चयन करना होगा। तीसरी भाषा के तौर पर छात्र किसी विदेशी भाषा को भी चुन सकते हैं, बशर्ते उनकी शुरुआती दो भाषाएं भारतीय हों।

बोर्ड परीक्षाओं और मार्किंग स्कीम पर क्या पड़ेगा इसका असर

इस नए भाषाई नियम को लेकर छात्रों के मन में सबसे बड़ा डर बोर्ड परीक्षा के तनाव को लेकर है। शिक्षा बोर्ड ने साफ किया है कि इस कदम का उद्देश्य छात्रों पर पढ़ाई का बोझ बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक कुशल बनाना है। नए अकादमिक क्रेडिट सिस्टम के तहत इन भाषाओं के अंकों को मुख्य विषयों के साथ जोड़ा जा सकता है, जिससे छात्रों के ओवरऑल स्कोरिंग पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिलेगा। सीबीएसई स्कूलों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने स्तर पर योग्य भाषा शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करें ताकि छात्रों को अपनी पसंद की भाषा चुनने में कोई परेशानी न हो।