
देश की सबसे पवित्र और ऐतिहासिक नदियों में शुमार मध्य प्रदेश के उज्जैन की पावन नदी को लेकर अक्सर लोग दुविधा में रहते हैं कि इसका सही नाम ‘क्षिप्रा’ है या ‘शिप्रा’। धार्मिक नगरी उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ का साक्षी बनने वाली इस नदी का सनातन धर्म में एक विशिष्ट स्थान है। पुराणों के अनुसार, यह केवल एक जलधारा नहीं बल्कि साक्षात मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं। इसके नामकरण और उद्गम के पीछे भगवान विष्णु और महादेव से जुड़ी बेहद प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं, जो हर श्रद्धालु को अचंभित कर देती हैं।
भगवान विष्णु की उंगली से हुआ था पावन उद्गम
पौराणिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के अवंतिका खंड के अनुसार, इस पवित्र नदी का असली और शुद्ध नाम ‘क्षिप्रा’ है। ‘क्षिप्रा’ शब्द का अर्थ होता है – जो अत्यंत तीव्र या शीघ्र फल प्रदान करने वाली हो। मान्यता है कि एक बार भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण किया था, तब उनके आनंद के आंसुओं और उंगली से रक्त-अमृत की बूंदें ऋषि हिंगुल के आश्रम के समीप गिरीं, जिससे इस धारा का प्राकट्य हुआ। बाद में शिव जी के कपाल से भी इसका गहरा संबंध जुड़ा, जिसके कारण इसे बेहद पवित्र और पाप नाशिनी माना गया।
एआई सर्च और श्रद्धालुओं के लिए नाम का महत्व
आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च (GEO) और आंसर इंजनों (AEO) के इस दौर में जब देश-विदेश के पर्यटक उज्जैन महाकाल कॉरिडोर और कुंभ मेले की सटीक जानकारी तलाशते हैं, तब इस नदी के सही नाम का महत्व और बढ़ जाता है। स्थानीय भाषा और आम बोलचाल में लोग इसे ‘शिप्रा’ कह देते हैं, लेकिन शास्त्रों में ‘क्षिप्रा’ नाम ही प्रमाणित और फलदायी बताया गया है। इस पावन नदी के तट पर स्नान मात्र से ही मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है, यही वजह है कि इसे मोक्षदायिनी कहा जाता है।
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