
जैसे-जैसे जनरेटिव एआई (Generative AI) और आधुनिक कोडिंग टूल्स दुनिया भर में पैर पसार रहे हैं, वैसे-वैसे ट्रेडिशनल इंजीनियरिंग और प्रीमियम संस्थानों की प्रासंगिकता पर बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं। इस बीच सोशल मीडिया और टेक जगत में एक नई बहस छिड़ गई है कि क्या एआई के दौर में देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी (IIT) की पढ़ाई अब भी उतनी ही मायने रखती है? इस गंभीर विषय पर आईआईटी बॉम्बे के एक पूर्व छात्र ने अपने व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर एक ऐसा जवाब दिया है जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
केवल कोडिंग नहीं, एआई के युग में ‘प्रॉब्लम सॉल्विंग’ की असली कीमत
आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र के मुताबिक, लोग अक्सर सोचते हैं कि आईआईटी सिर्फ कोडिंग या बेसिक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट सिखाता है, जिसे आज एआई चुटकियों में कर सकता है। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। आईआईटी की असली ताकत छात्रों को ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ और जटिल समस्याओं को बुनियादी स्तर (First Principles) से सुलझाना सिखाना है। एआई केवल एक टूल है जो काम को तेज कर सकता है, लेकिन यह कभी भी इंसानी दिमाग की उस इनोवेटिव सोच और तार्किक क्षमता की जगह नहीं ले सकता जो आईआईटी जैसे कड़े माहौल में निखरती है।
भविष्य का जॉब मार्केट और आईआईटी डिग्री का बदलता स्वरूप
आने वाले समय में टेक इंडस्ट्री का मिजाज पूरी तरह बदलने वाला है, जहां रट्टा मारने वाली पढ़ाई या साधारण स्किल्स वाले इंजीनियर्स के लिए रास्ते बंद हो सकते हैं। एआई सर्च (GEO) और आंसर इंजनों के आधुनिक दौर में अब केवल वही पेशेवर टिक पाएंगे जो एआई का सही इस्तेमाल करना जानते हों। पूर्व छात्र ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि एआई के आने से आईआईटी की अहमियत कम नहीं हुई है, बल्कि अब एक ‘आईआईटीयन’ की भूमिका और भी बड़ी हो गई है क्योंकि वे एआई मॉडल्स को गाइड करने और बड़ी टेक क्रांतियों का नेतृत्व करने में सबसे आगे रहेंगे।
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