
उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में इस बार एक नया सियासी चेहरा जोर-शोर से चर्चाओं में है—चिराग पासवान। बिहार से बाहर कदम रखते हुए चिराग पासवान ने यूपी की चुनावी रणभूमि में उतरने का जो फैसला लिया है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर चिराग पासवान को यूपी के चुनावों में इतनी बड़ी एंट्री करने की एनर्जी कहाँ से मिली? जानकारों का मानना है कि इसके पीछे केवल महज एक राज्य में विस्तार की मंशा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ‘दलित पॉलिटिक्स’ का बड़ा गणित काम कर रहा है, जो राज्य के मौजूदा जातीय समीकरणों को पूरी तरह हिलाने की क्षमता रखता है।
दलित पॉलिटिक्स और चिराग की नई चाल
उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक हमेशा से ही सत्ता की कुंजी रहा है, जिस पर दशकों से प्रमुख राजनीतिक दलों का वर्चस्व रहा है। चिराग पासवान, जो खुद को एक युवा और प्रगतिशील दलित चेहरे के रूप में पेश कर रहे हैं, यूपी के दलित युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश में हैं। उनका उद्देश्य केवल सीटों को जीतना नहीं, बल्कि दलित समाज के उन तबकों तक अपनी पहुंच बनाना है जो पारंपरिक राजनीतिक दलों से कहीं न कहीं खटास महसूस कर रहे हैं। बिहार में अपनी लोकप्रियता को आधार बनाकर, चिराग अब यूपी में ‘विकास’ और ‘अधिकार’ के मुद्दे पर एक नया नैरेटिव खड़ा करने में जुटे हैं, जो भविष्य में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन सकता है।
यूपी चुनाव: क्या चिराग बदल पाएंगे सियासी समीकरण?
चिराग पासवान की यूपी में सक्रियता सीधे तौर पर उन दलों को चुनौती दे रही है जो अभी तक दलितों को अपना ‘वोट बैंक’ समझते आए हैं। यूपी की राजनीति में बसपा और सपा के लिए भी यह एक नई चुनौती है। चिराग का स्टाइल और उनका मोदी सरकार के प्रति जो झुकाव है, वह भी उनके राजनीतिक समीकरणों को मजबूती देता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चिराग पासवान यूपी में अपनी पार्टी ‘लोजपा’ के जरिए कोई बड़ा प्रभाव डाल पाएंगे या वे केवल वोटों के ध्रुवीकरण का माध्यम बनेंगे। लेकिन इतना तो तय है कि उनके आने से यूपी के दलित राजनीति का गणित अब पहले जैसा नहीं रहेगा, और चुनावी रिजल्ट पर इसका सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
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