
देश के कई हिस्सों में अब तक सूखा झेल रहे किसानों और आम जनता के लिए मौसम के मोर्चे से एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है. जून के महीने में सामान्य से काफी कम बारिश होने के कारण जहां खेती-किसानी और जल संसाधनों को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई थीं, वहीं अब मानसून ने एक बार फिर करवट ले ली है. मौसम की ताजा परिस्थितियां और सैटेलाइट तस्वीरें साफ संकेत दे रही हैं कि मानसून की सुस्त पड़ी रफ्तार अब पूरी तरह से ‘सुपरएक्टिव’ मोड में आ चुकी है. मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, आने वाले 72 घंटों के भीतर उत्तर भारत के कई राज्यों में झमाझम बारिश होने की पूरी संभावना है, जो सूखे खेतों की प्यास बुझाने का काम करेगी.
40% की भारी कमी के बाद बदला मौसम का मिजाज, उमस से मिलेगी मुक्ति
चालू सीजन में अब तक देश के बड़े हिस्से में उम्मीद के मुताबिक बादल नहीं बरसे हैं, जिसके चलते जून के अंत तक सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम वर्षा रिकॉर्ड की गई थी. इस भारी कमी की वजह से खरीफ की फसलों पर संकट मंडराने लगा था. लेकिन पिछले 24 से 48 घंटों में मौसम प्रणालियों (Weather Systems) में आए अचानक और बड़े बदलाव के बाद देश के कई राज्यों में बारिश की गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगी हैं. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उत्तर भारत के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में अगले तीन दिनों तक हल्की से मध्यम और कुछ खास पॉकेट्स में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है. इस मानसूनी बौछार से न सिर्फ पारे में भारी गिरावट आएगी, बल्कि पिछले कई दिनों से पसीने छुड़ा रही उमस भरी चिपचिपी गर्मी से भी लोगों को बड़ी राहत मिलेगी.
खरीफ फसलों को मिलेगा ‘संजीवनी’ बूस्टर, बुवाई पकड़ेगी रफ्तार
अगर मौसम विभाग का यह ताजा अनुमान पूरी तरह सटीक बैठता है, तो यह देश की कृषि व्यवस्था के लिए किसी संजीवनी बूस्टर से कम नहीं होगा. धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी मुख्य खरीफ फसलों की बुवाई के लिए यह बारिश बेहद जरूरी मानी जा रही है. जिन इलाकों में पानी की कमी के कारण बुवाई अटकी हुई थी, वहां किसान दोबारा खेतों का रुख कर सकेंगे. इसके साथ ही देश के प्रमुख जलाशयों (Reservoirs) के गिरते जलस्तर और भूजल स्तर (Groundwater Level) को सुधारने में भी इस बारिश से काफी मदद मिलेगी. हालांकि, मौसम विभाग ने एक जरूरी एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि जिन क्षेत्रों में ‘भारी बारिश का रेड या ऑरेंज अलर्ट’ है, वहां के लोग स्थानीय प्रशासन की चेतावनियों पर पैनी नजर रखें, क्योंकि अचानक तेज बारिश से निचले इलाकों में जलभराव और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.
125 सालों का रिकॉर्ड: जून बना पांचवां सबसे सूखा महीना
इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत बेहद कमजोर और अनिश्चित रही थी. जून का पूरा महीना बीत जाने के बाद भी मानसूनी हवाएं देश को उस तरह नहीं भिगो पाईं जैसी उम्मीद जताई गई थी. आईएमडी (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 29 जून तक पूरे देश में सामान्य से लगभग 42 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई थी, जिसने कृषि एक्सपर्ट्स को चिंता में डाल दिया था. हालांकि महीने के आखिरी दो दिनों में मानसून ने थोड़ी रफ्तार जरूर पकड़ी, जिससे यह आंकड़ा सुधरकर 39 से 40 फीसदी की कमी पर आकर थमा. ऐतिहासिक तौर पर देखें तो पिछले 125 सालों के इतिहास में यह जून का महीना पांचवां सबसे सूखा महीना दर्ज किया गया है. यही वजह है कि अब जब मानसून दोबारा एक्टिव हुआ है, तो इसे कृषि और जल प्रबंधन के लिहाज से बेहद टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है.
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