अमेरिका-ईरान शांति समझौते से ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल क्रैश: क्या भारत खरीदेगा ईरान का सस्ता तेल?

ग्लोबल एनर्जी मार्केट से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। लंबे समय के तनाव के बाद अब अमेरिका और ईरान शांति समझौते की ओर बढ़ रहे हैं। अमेरिका ने ईरान की प्रमुख शर्तें मान ली हैं, जिसके बाद सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जहाजों और तेल टैंकरों की आवाजाही एक बार फिर सामान्य रूप से शुरू हो गई है।

इस भू-राजनीतिक (Geopolitical) बदलाव का सबसे बड़ा और सीधा असर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर पड़ा है। वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल के दामों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। इस बीच, ईरानी तेल पर प्रतिबंधों से मिली अस्थायी छूट के बाद भारत के लिए भी एक बड़ा मौका बनता दिख रहा है। देश को रूस के बाद तेल का एक और बड़ा और सस्ता सप्लायर मिलने की उम्मीद जागी है, जिससे भारत का तेल संकट हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। ईरान के तेल से भरे कई जहाजों का बेड़ा भारतीय तटों के करीब खड़ा है और बस हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहा है। लेकिन क्या भारत के लिए इस तेल को खरीदना इतना आसान होगा? आइए समझते हैं इस पूरे समीकरण को।

अमेरिका ने ईरान को दी 60 दिनों की अस्थायी मोहलत

इस शांति समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान को बड़ी राहत देते हुए उसके क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट (निर्यात) पर लगे कड़े प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से हटा लिया है। अमेरिका द्वारा ईरान को यह छूट 60 दिनों के लिए दी गई है, जो 21 अगस्त 2026 तक प्रभावी रहेगी। पिछले 8 वर्षों में यह पहली बार है जब ईरानी तेल के निर्यात पर इस तरह की बड़ी ढील दी गई है। जैसे ही वाशिंगटन से प्रतिबंध हटाने का आधिकारिक ऐलान हुआ, तेहरान के अधिकारी, तेल कारोबारी, बिचौलिये और नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी (NIOC) के बड़े अफसर भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों के रिफाइनरों से संपर्क साधने में जुट गए हैं।

दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल भंडार बाजार में उतरने को बेताब

ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट और वोर्टेक्स के डेटा के अनुसार, अमेरिकी छूट मिलते ही ईरान अपनी तेल सप्लाई का दायरा युद्ध स्तर पर बढ़ाने की जुगत में लग गया है। ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार (लगभग 209 अरब बैरल) है। कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान अब तक खुले बाजार में तेल नहीं बेच पा रहा था और उसे मजबूरन अपना अधिकांश तेल चोरी-छिपे चीन को बेहद कम दामों में बेचना पड़ता था। लेकिन अब वह अपनी पहुंच का विस्तार करना चाहता है और इसके लिए ईरानी तेल सप्लायर लगातार भारत की सरकारी और निजी तेल रिफाइनरियों से तालमेल बिठा रहे हैं।

समंदर में तैर रहा है 6.8 करोड़ बैरल कच्चा तेल

डेटा के मुताबिक, 22 जून 2026 तक समंदर में लगभग 6.8 करोड़ बैरल कच्चा ईरानी तेल और कंडेनसेट तैर रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से करीब 85 फीसदी तेल टैंकर ऐसे हैं, जिनका कोई पक्का डेस्टिनेशन यानी खरीदार तय नहीं है। ईरान इन तैरते हुए तेल भंडारों के लिए तुरंत नया खरीदार चाहता है और ये कार्गो भारतीय समुद्री सीमा के काफी नजदीक मौजूद हैं, जहां से भारत को सप्लाई करना बेहद आसान और कम खर्चीला है। हालांकि, ईरान जितनी जल्दबाजी में है, भारत सहित अन्य एशियाई देश उतनी उत्सुकता नहीं दिखा रहे हैं। दरअसल, होर्मुज रूट बंद होने के दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने पहले ही अन्य देशों से तेल आपूर्ति का वैकल्पिक इंतजाम कर लिया था।

ईरानी तेल की खरीद के आड़े आ रही हैं ये 3 बड़ी मुश्किलें

ईरान से तेल खरीदना भारत के लिए तकनीकी और कूटनीतिक रूप से इतना आसान नहीं है। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़ी चुनौतियां हैं:

  • अस्थायी छूट का डर: अमेरिका की यह छूट केवल 60 दिनों के लिए है। रिफाइनरियों को डर है कि यह छूट कभी भी बीच में खत्म हो सकती है, जिससे उनकी पूरी प्लानिंग प्रभावित होगी।

  • यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन के प्रतिबंध: भले ही अमेरिका ने ढील दे दी हो, लेकिन यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिटेन ने अभी भी ईरानी तेल पर प्रतिबंध जारी रखे हैं। इसके कारण तेल व्यापार के लिए इंटरनेशनल फाइनेंसिंग, पेमेंट गेटवे और जहाजों का बीमा (Insurance) कराने में भारी दिक्कतें आ रही हैं।

  • ‘डार्क फ्लीट’ जहाजों की समस्या: दुनिया के कई प्रमुख पोर्ट्स (बंदरगाह) सुरक्षा और प्रतिबंधों के डर से ईरान के ‘डार्क फ्लीट’ यानी बिना पहचान वाले संदिग्ध जहाजों को अपने यहां एंट्री देने के लिए तैयार नहीं हैं।

एनर्जी एक्सपर्ट्स और केपलर (Kpler) के रिफाइनिंग लीड एनालिस्ट सुमित रिटोलिया के अनुसार, इसकी संभावना बेहद कम है कि चीन के अलावा कोई और देश ईरानी तेल की खरीद में बड़ी बढ़ोतरी करेगा। तेल रिफाइनरियों की प्लानिंग साइकिल आमतौर पर 2 से 3 महीने पहले से चलती है, जबकि ईरान को सिर्फ 60 दिनों की छूट मिली है। भारत की अधिकांश रिफाइनरियों ने अगस्त तक के आयात का सौदा पहले ही पूरा कर लिया है।

क्या रूस को छोड़ ईरान का रुख करेंगी भारतीय रिफाइनरियां?

आमतौर पर भारतीय रिफाइनरियां किसी भी प्रकार के प्रतिबंधित या विवादित कच्चे तेल की खरीद से दूरी बनाना पसंद करती हैं ताकि वैश्विक प्रतिबंधों की चपेट में आने से बचा जा सके। फिलहाल भारत को रूस से रिकॉर्ड मात्रा में और बेहद किफायती दामों पर कच्चे तेल की निर्बाध सप्लाई मिल रही है। इसके अलावा भारत अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देशों से भी तेल का आयात बढ़ा रहा है। चूंकि ईरान से मिलने वाली छूट बेहद कम समय के लिए है, इसलिए भारत अपने पुराने और भरोसेमंद तेल सप्लायर देशों से संबंध बिगाड़ना या उनसे आयात कम करना नहीं चाहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ईरान से तेल तभी खरीदेगा, जब ईरान तेल की कीमतों पर रूस से भी ज्यादा आकर्षक और भारी डिस्काउंट देने को तैयार हो।