
बुलियन मार्केट (Bullion Market) में पिछले दो साल से जारी ताबड़तोड़ तेजी के रथ पर अब पूरी तरह ब्रेक लग गया है। मौजूदा जून २०२६ तिमाही खत्म होने में अब महज कुछ ही दिन बचे हैं, और कीमती धातुओं की जो चाल दिख रही है, उस हिसाब से यह तिमाही सोने और चांदी के निवेशकों के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित होने जा रही है।
सोना और चांदी दोनों ही इस तिमाही में निगेटिव जोन (Negative Zone) में एंट्री करने जा रहे हैं, जिसके साथ ही पिछले लगातार पांच तिमाहियों से जारी इनकी बढ़त का सिलसिला टूट जाएगा। सोने की हालत तो इतनी खराब है कि यह पिछले १० साल की सबसे बड़ी तिमाही गिरावट की तरफ बढ़ रहा है, जबकि चांदी की चमक ४ साल में सबसे अधिक फीकी होने वाली है।
कितना फीका हुआ सोना और चांदी? (तिमाही और रिकॉर्ड हाई का गणित)
पिछले दो सालों में रिकॉर्ड मुनाफा देने के बाद, जून तिमाही में सोने-चांदी की कीमतों में आई गिरावट ने बाजार विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है:
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सोने (Gold) में गिरावट: इस चालू तिमाही में अब तक सोने के भाव १२% नीचे आ चुके हैं। यह दिसंबर २०१६ के बाद से गोल्ड की सबसे बड़ी तिमाही गिरावट दर्ज होने जा रही है। यदि इसके ऑल-टाइम रिकॉर्ड हाई से तुलना करें, तो सोना प्रति औंस (२८.३५ ग्राम) $५,४१७ के उच्चतम स्तर से २४% तक टूट चुका है।
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चांदी (Silver) में क्रैश: चांदी की चमक इस तिमाही में १७.६% फिसल चुकी है, जो जून २०२२ के बाद की सबसे तेज गिरावट है। वहीं, २८ जनवरी को बने प्रति औंस $११७ के ऐतिहासिक रिकॉर्ड हाई से चांदी लगभग ४७% (आधे के करीब) लुढ़क चुकी है।
तेजी के बाद क्यों आई इतनी बड़ी मंदी? एक्सपर्ट्स ने बताए ३ मुख्य कारण
एक्सिस डायरेक्ट के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटीज) देवेया गागलानी (Deveya Gaglani) और अन्य कमोडिटी एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सोने और चांदी की इस लगातार गिरावट के पीछे वैश्विक आर्थिक नीतियां और कूटनीतिक बदलाव जिम्मेदार हैं:
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अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड की मजबूती: अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (Dollar Index) हाल ही में अपने एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। इसके साथ ही अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) भी हाई लेवल पर बनी हुई है। चूंकि सोने-चांदी पर कोई ब्याज या निश्चित रिटर्न नहीं मिलता, इसलिए मजबूत डॉलर के दौर में निवेशक कीमती धातुओं को छोड़कर डॉलर और ट्रेजरी जैसे विकल्पों में पैसा लगा रहे हैं।
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अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) का सख्त रुख: अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेड) के नए चेयरमैन केविन वार्श ने अपनी हालिया मौद्रिक नीति बैठक में भले ही ब्याज दरों को फिलहाल स्थिर रखा हो, लेकिन इस साल एक बार और दरें बढ़ाने के साफ संकेत दिए हैं। लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों का यह माहौल सोने के लिए सबसे बड़ा दुश्मन साबित हो रहा है।
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महंगाई (Inflation) की चिंता: शिकागो फेडरल रिजर्व बैंक के प्रेसिडेंट ऑस्टन गूल्सबी (Austan Goolsbee) ने हाल ही में बयान दिया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था लंबे समय से लक्ष्य से कहीं अधिक मुद्रास्फीति की समस्या से जूझ रही है और हाल के रुझान सही दिशा में नहीं हैं। महंगाई बढ़ने के इस खतरे से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें धूमिल हो गई हैं।
अमेरिका-ईरान शांति समझौते का भी नहीं मिला फायदा
शुरुआत में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (Geo-political Tension) और पश्चिमी एशिया में युद्ध के बाद कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आग लग गई थी, जिसने सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में सपोर्ट दिया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जब दोनों देशों के बीच शांति समझौता हो गया और कच्चे तेल की कीमतें फिसल गईं, तब भी सोने-चांदी पर दबाव जारी रहा। इसकी वजह यह रही कि फेड के सख्त रुख और डॉलर की मजबूती ने शांति समझौते के सकारात्मक असर को पूरी तरह फीका कर दिया।
एक्सपर्ट कमेंट (देवेया गागलानी):
“भू-राजनीतिक तनाव कम होने के बावजूद अमेरिकी फेड के सख्त रुख और डॉलर इंडेक्स में आए तेज उछाल के कारण बुलियन मार्केट पर दबाव बना हुआ है। जब तक डॉलर इंडेक्स $१०० के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर बना रहेगा, तब तक सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी रिकवरी की उम्मीद कम है और बाजार पर मंदी का दबाव हावी रह सकता है।”
अब किस बात पर टिकी है निवेशकों की नजर?
सोने-चांदी के भविष्य और फेडरल रिजर्व के अगले कदम को समझने के लिए वैश्विक निवेशकों की नजर अब गुरुवार को जारी होने वाले अमेरिकी पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों पर टिकी है। बाजार को आशंका है कि पीसीई (PCE) इंडेक्स के आंकड़े तेज आ सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो अमेरिकी फेड आने वाले समय में ब्याज दरों को और सख्त कर सकता है, जिससे सोने-चांदी की कीमतों में आने वाले दिनों में और गिरावट देखने को मिल सकती है।
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