रामायण का वो ‘अदृश्य योद्धा’ जो पलक झपकते ही गायब हो जाता था, जानें कैसे हुआ इस मायावी का अंत

रामायण काल में एक से बढ़कर एक शक्तिशाली और पराक्रमी योद्धा हुए हैं। प्रभु श्री राम की वानर सेना और रावण की राक्षसी सेना के बीच जब लंका की धरती पर भीषण युद्ध छिड़ा, तो दोनों ओर के महारथी एक-दूसरे पर भारी पड़ रहे थे। लेकिन रावण की सेना में एक ऐसा योद्धा भी शामिल था, जो सिर्फ अपनी शारीरिक शक्ति से नहीं बल्कि अपनी अचूक ‘माया’ से पूरे युद्ध का रुख पलट देता था। वह रणभूमि में लड़ते-लड़ते अचानक दुश्मनों की आंखों के सामने से गायब हो जाता था और आसमान से बाणों की ऐसी खौफनाक बारिश करता था कि वानर सेना में हाहाकार मच जाता था। इस महापराक्रमी योद्धा का नाम था मेघनाद, जिसे दुनिया ‘इंद्रजीत’ के नाम से भी जानती है। आइए जानते हैं मेघनाद की इस अदृश्य होने वाली शक्ति का असली रहस्य और कैसे लक्ष्मण जी ने उसका अंत किया।

भगवान शिव से मिला था अदृश्य होने का अनोखा वरदान

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मेघनाद भगवान शिव का परम भक्त था। उसकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे कई दिव्य अस्त्र-शस्त्र और चमत्कारी शक्तियां उपहार में दी थीं। इन्हीं शक्तियों में से एक सबसे खतरनाक शक्ति थी ‘तामसी माया’। इसी मायावी शक्ति के प्रभाव से वह युद्ध के दौरान स्वयं को पूरी तरह अदृश्य यानी गायब कर सकता था। जब भी मेघनाद रणभूमि में संकट में घिरता, वह घने काले बादलों की आड़ लेकर आकाश में छिप जाता था। इसके बाद वह आसमान से ऐसे दिव्य अस्त्र बरसाता था कि दुश्मन बिना देखे ही मारे जाते थे। शत्रु को यह तो पता होता था कि हमला ऊपर से हो रहा है, लेकिन मेघनाद दिखाई न देने के कारण उस पर पलटवार करना नामुमकिन हो जाता था।

मेघनाद कैसे बना तीनों लोकों को डराने वाला ‘इंद्रजीत’

मेघनाद को ‘इंद्रजीत’ नाम मिलने के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प और गौरवशाली इतिहास है। कहा जाता है कि एक बार स्वर्ग पर आक्रमण के दौरान उसने देवताओं के राजा इंद्र को युद्ध में बुरी तरह पराजित कर दिया था और उन्हें बंदी बनाकर लंका ले आया था। इस घटना से देवलोक में हड़कंप मच गया। बाद में खुद सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी को बीच-बचाव करने आना पड़ा। ब्रह्मा जी के कहने पर ही मेघनाद ने देवराज इंद्र को मुक्त किया था। इंद्र पर इतनी बड़ी विजय प्राप्त करने के कारण ही ब्रह्मा जी ने उसे ‘इंद्रजीत’ की उपाधि दी, जिसका सीधा अर्थ है— ‘इंद्र को जीतने वाला’। इसके बाद उसका खौफ तीनों लोकों में फैल गया था।

जब मेघनाद के पराक्रम से संकट में पड़ गए थे प्रभु श्री राम और लक्ष्मण

लंका युद्ध के दौरान मेघनाद ने अकेले ही वानर सेना को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था। अपनी मायावी शक्तियों और खतरनाक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करके उसने एक समय पर खुद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी को भी बेहद कठिन परिस्थिति में डाल दिया था। युद्ध के एक मोड़ पर तो उसने नागपाश अस्त्र का इस्तेमाल कर दोनों भाइयों को नागों के बंधन में जकड़ दिया था, जिससे पूरी वानर सेना गहरे सदमे और भय में डूब गई थी।

क्या था मेघनाद की अजेय शक्ति और अमरता का असली रहस्य

मेघनाद की अजेय शक्ति का सबसे बड़ा राज छुपा था ‘निकुंभिला देवी’ के मंदिर में होने वाले एक गुप्त यज्ञ में। मेघनाद को यह वरदान प्राप्त था कि यदि वह युद्ध में जाने से पहले इस विशेष यज्ञ को बिना किसी बाधा के पूरा कर लेता, तो संसार की कोई भी ताकत उसे हरा नहीं सकती थी। इस गुप्त रहस्य की जानकारी रावण के भाई विभीषण को थी। जब विभीषण ने रावण का साथ छोड़कर श्रीराम की शरण ली, तब उन्होंने लक्ष्मण जी को आगाह किया कि मेघनाद को हराने का एकमात्र तरीका यही है कि उसके इस यज्ञ को पूरा होने से पहले ही नष्ट कर दिया जाए।

विभीषण की नीति और लक्ष्मण जी के बाण से ऐसे हुआ वध

विभीषण की इस गुप्त सलाह पर लक्ष्मण जी, हनुमान जी और वानर सेना के कुछ प्रमुख योद्धाओं के साथ निकुंभिला देवी के मंदिर पहुंचे। वहां मेघनाद पूरी एकाग्रता के साथ यज्ञ की अंतिम आहुतियां दे रहा था। वानर सेना ने वहां अचानक धावा बोलकर उसके यज्ञ को बीच में ही भंग कर दिया। यज्ञ के अधूरा रह जाने के कारण मेघनाद की वो अजेय और अमर कर देने वाली शक्ति कमजोर पड़ गई। इसके बाद लक्ष्मण जी और मेघनाद के बीच लंका की धरती पर एक ऐसा भयंकर और ऐतिहासिक युद्ध हुआ जिसकी गूंज आज भी पुराणों में है। दोनों महान योद्धाओं ने एक-दूसरे पर अपने सबसे विनाशकारी दिव्य अस्त्रों का प्रहार किया, लेकिन अंततः लक्ष्मण जी ने एक अचूक और शक्तिशाली बाण छोड़कर महापराक्रमी मेघनाद का वध कर दिया।