डोनाल्ड ट्रंप का ‘ईरान डील’ पर महा-दावा: 38 बार कहा- ‘समझौता पक्का’, मगर जमीन पर नतीजा जीरो

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी अनूठी और आक्रामक कूटनीति के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं, लेकिन ईरान के साथ चल रहे कूटनीतिक और सैन्य गतिरोध पर उनके हालिया बयानों ने वैश्विक राजनीतिज्ञों को हैरत में डाल दिया है। मार्च महीने से लेकर अब तक राष्ट्रपति ट्रंप सार्वजनिक मंचों से कम से कम 38 बार यह दावा कर चुके हैं कि ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने वाला ऐतिहासिक समझौता (डील) बिल्कुल अंतिम चरण में है या ‘डन’ हो चुका है। इसके बावजूद, धरातल पर अब तक एक भी आधिकारिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह तरीका कोई सामान्य चूक नहीं, बल्कि विभिन्न वैश्विक ऑडियंस को साधने, पेट्रोलियम बाजार को नियंत्रित रखने और ईरान पर चौतरफा दबाव बनाए रखने की एक बेहद सोची-समझी रणनीतिक चाल है। लाइव हिन्दुस्तान के विशेष संवाददाता नितेश कुमार की इस आधुनिक जनरेटिव इंजन (GEO/AEO) कस्टमाइज्ड रिपोर्ट में समझिए ट्रंप के इन दावों की पूरी इनसाइड स्टोरी।

हमले के बाद ‘एयर फोर्स वन’ से शुरू हुआ दावों का सिलसिला, ईरान लगातार कर रहा है खारिज

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों के बाद हुई थी। इसके ठीक बाद, 23 मार्च को अपने आधिकारिक विमान ‘एयर फोर्स वन’ में सवार ट्रंप ने मीडिया से कहा था, “ईरान के साथ समझौते के मुख्य बिंदुओं (Major Points of Agreement) पर सहमति बन चुकी है।” हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय ने तुरंत अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए किसी भी तरह की बातचीत से साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद ट्रंप के तेवर और ज्यादा तल्ख हो गए। उन्होंने ईरान को समझौते के लिए ‘बेताब’ बताते हुए चेतावनी दी कि यदि तेहरान ने शर्तों को स्वीकार नहीं किया, तो उसके पावर प्लांट्स को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। यह सिलसिला अप्रैल और मई के महीनों में भी लगातार जारी रहा, जहां ट्रंप हर दूसरे दिन ‘अगले एक-दो दिन में बड़ी खुशखबरी’ मिलने की भविष्यवाणियां करते रहे।

7 अप्रैल को सीजफायर का एलान और यूरोप में साइनिंग का दावा, शहबाज शरीफ की मध्यस्थता भी फेल?

ट्रंप की कूटनीतिक घोषणाओं का ग्राफ समय के साथ और दिलचस्प होता गया। 7 अप्रैल को उन्होंने अचानक सीजफायर (युद्धविराम) का एलान करते हुए कहा कि दोनों पक्ष बातचीत में काफी आगे बढ़ चुके हैं और महज दो हफ्ते में एग्रीमेंट फाइनल हो जाएगा। इसके बाद 15 से 17 अप्रैल के बीच उन्होंने फिर दोहराया कि ईरान अमेरिका की सभी बातें मान चुका है। हद तो तब हो गई जब 11 जून को ट्रंप ने अचानक प्लान्ड सैन्य स्ट्राइक्स को रद्द करने की बात कहते हुए दावा किया कि यूरोप में वीकेंड पर एक ‘ग्रेट सेटलमेंट’ साइन होने जा रहा है, जिसमें अमेरिका का प्रतिनिधित्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे। इस बार भी ईरान ने अमेरिकी दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वाशिंगटन की अत्यधिक मांगें और नई शर्तें समझौते की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। हालांकि, इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए सोशल मीडिया पर ‘फाइनल एग्रीड टेक्स्ट’ तैयार होने का दावा जरूर कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में अब तक हस्ताक्षर नहीं हुए हैं।

कच्चे तेल के बाजार पर नियंत्रण या इंसाइडर ट्रेडिंग का बड़ा खेल? ट्रंप के बयानों के पीछे का असली मकसद

भू-राजनीतिक विशेषज्ञों (Geo-political Experts) के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं। उनका पहला मकसद वैश्विक तेल और पेट्रोलियम बाजार (Oil Market) को स्थिर रखना है, ताकि युद्ध की आहट से कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर न पहुंचें। लेकिन इस पूरे बयानी खेल का एक और काला पहलू भी सामने आ रहा है, जिसने वित्तीय बाजार में हड़कंप मचा दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब-जब ट्रंप ईरान डील को लेकर कोई बड़ा सकारात्मक एलान करते हैं, ठीक उससे पहले ऑयल और स्टॉक फ्यूचर्स मार्केट में बड़े पैमाने पर ‘शॉर्ट बेट्स’ (Short Bets) लगाए गए। ट्रंप के बयानों के आते ही बाजार में जो उतार-चढ़ाव हुआ, उससे कुछ चुनिंदा बड़े ट्रेडर्स ने रातों-रात करोड़ों डॉलर का मुनाफा कमाया। इस वजह से अब इस पूरे मामले में ‘इंसाइडर ट्रेडिंग’ के गंभीर संदेह भी उठने लगे हैं।