
महीनों से जारी भीषण तनाव और खूनखराबे के बीच मिडिल ईस्ट से शांति की एक बहुत बड़ी उम्मीद जगाने वाली खबर आई है। इजरायल और लेबनान मंगलवार को एक ऐतिहासिक युद्धविराम (सीजफायर) को नवीनीकृत करने पर पूरी तरह सहमत हो गए हैं। दोनों देशों के बीच यह बेहद महत्वपूर्ण समझौता अमेरिका की मध्यस्थता में हुई चौथे दौर की मैराथन वार्ता के बाद मुमकिन हो पाया है। इस समझौते के लागू होने से न केवल सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लाखों नागरिकों को राहत मिलेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति बहाली की संभावना भी मजबूत हुई है। इस शांति समझौते के तहत लेबनान के भीतर कई विशेष प्रायोगिक सुरक्षा क्षेत्र (Experimental Security Zones) बनाए जाएंगे, जहां हिजबुल्ला की एंट्री पर पूरी तरह बैन होगा।
लिटानी नदी से पीछे हटना मजबूरी, इन मुख्य शर्तों पर झुका लेबनान
अमेरिकी विदेश विभाग में हुई इस हाई-प्रोफाइल बैठक के बाद सीजफायर को लेकर कई कड़ी शर्तें सामने आई हैं, जिन्हें दोनों देशों को हर हाल में मानना होगा। इस ऐतिहासिक शांति समझौते के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं:
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हिजबुल्ला को इजरायल के खिलाफ अपनी सभी सैन्य गतिविधियां और गोलीबारी तुरंत प्रभाव से पूरी तरह बंद करनी होगी।
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लिटानी नदी के दक्षिण में पड़ने वाले सभी रणनीतिक क्षेत्रों से हिजबुल्ला के लड़ाकों को अपने घातक हथियारों के साथ पीछे हटना होगा।
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इन खाली किए गए सभी सुरक्षा क्षेत्रों का पूर्ण नियंत्रण लेबनान की आधिकारिक राष्ट्रीय सेना को सौंप दिया जाएगा।
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इन विशेष क्षेत्रों के भीतर हिजबुल्ला की किसी भी तरह की संदिग्ध सैन्य या राजनीतिक गतिविधि पर पूरी तरह सख्त कानूनी प्रतिबंध रहेगा।
ईरान का दखल अब बर्दाश्त नहीं, संयुक्त बयान में मिला कड़ा संदेश
अमेरिकी विदेश विभाग में हुई इस सफल वार्ता के बाद इजरायल और लेबनान की तरफ से एक साझा संयुक्त बयान जारी किया गया है। इस बयान में साफ शब्दों में कहा गया है कि यह कदम मिडिल ईस्ट में व्यापक शांति और सुरक्षा स्थापित करने की दिशा में एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण प्रगति है। इसके साथ ही इस समझौते के जरिए हिजबुल्ला के सबसे बड़े मददगार देश ईरान को भी बेहद कड़ा और सीधा संदेश दिया गया है। संयुक्त बयान में जोर देकर कहा गया है कि इजरायल और लेबनान के बीच भविष्य के संबंध सिर्फ और सिर्फ उनकी संप्रभु सरकारें ही तय करेंगी। लेबनान के अंदरूनी मामलों और उसके भविष्य को प्रभावित करने के किसी भी बाहरी देश (राज्य) या उग्रवादी संगठन (गैर-राज्य अभिकर्ता) के प्रयासों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाएगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सीधी चेतावनी सीधे तौर पर तेहरान के लिए है।
वार्ता की मेज से गायब रहा हिजबुल्ला, क्या टिक पाएगा यह युद्धविराम?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी और ध्यान देने वाली बात यह रही कि इस बेहद महत्वपूर्ण वार्ता के दौरान हिजबुल्ला का कोई भी प्रतिनिधि मेज पर मौजूद नहीं था। सुरक्षा क्षेत्रों को जमीनी स्तर पर कैसे लागू किया जाएगा और वहां लेबनानी सेना की तैनाती का खाका क्या होगा, इसकी विस्तृत योजना को अभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि, लेबनानी सेना ने भरोसा दिया है कि वह इन संवेदनशील इलाकों में अपना पूर्ण नियंत्रण सुनिश्चित करेगी। अमेरिकी मध्यस्थता से हुई इस वार्ता को पिछले कई महीनों से जारी खूनी संघर्ष को थामने की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि जमीनी स्तर पर हिजबुल्ला की असल भूमिका और पर्दे के पीछे से ईरान का अगला रुख ही यह तय करेगा कि यह युद्धविराम कितना लंबा टिक पाता है।
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