वाशिंगटन/तेहरान: मिडिल ईस्ट में पिछले कई हफ्तों से जारी बारूद की गंध अब कम होती नजर आ रही है। कूटनीतिक गलियारों से आ रही ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, 21 अप्रैल को खत्म हो रहे युद्धविराम (Ceasefire) की समय सीमा से ठीक पहले अमेरिका और ईरान एक संभावित समझौते यानी ‘फ्रेमवर्क डील’ के काफी करीब पहुंच गए हैं। ‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत अब एक निर्णायक मोड़ पर है।
पाकिस्तान की ‘सरप्राइज’ एंट्री: जनरल मुनीर पहुंचे तेहरान
इस पूरी शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान एक “प्रभावी मध्यस्थ” के रूप में उभरकर सामने आया है। बुधवार को पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर एक उच्चस्तरीय दल के साथ तेहरान पहुंचे। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने भी माना है कि पाकिस्तान इस समय मध्यस्थता में अहम भूमिका निभा रहा है। खबर यह भी है कि अगले दौर की सीधी वार्ता (Face-to-Face Talks) भी पाकिस्तान की जमीन पर ही आयोजित की जा सकती है। पाकिस्तान के अलावा मिस्र और तुर्की भी इस प्रक्रिया में शामिल हैं।
ट्रंप की ‘A-टीम’ संभाल रही है मोर्चा
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को अपनी सबसे बड़ी विदेश नीति की जीत बनाने के लिए अपनी सबसे भरोसेमंद टीम को मैदान में उतारा है।
प्रमुख खिलाड़ी: उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और सलाहकार जैरेड कुशनर सीधे तौर पर ईरानी प्रतिनिधियों के संपर्क में हैं।
चुनौती: अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि डील के करीब होने के बावजूद ईरान के भीतर अलग-अलग राजनीतिक गुटों (Hardliners vs Reformists) को एक साथ लाना सबसे मुश्किल काम साबित हो रहा है।
21 अप्रैल के बाद भी बढ़ सकता है सीजफायर
अगर अगले 72 घंटों में किसी ‘शुरुआती ढांचे’ पर सहमति बन जाती है, तो 21 अप्रैल को खत्म हो रहे युद्धविराम को आगे बढ़ाया जा सकता है। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका किसी कमजोरी में नहीं, बल्कि ‘बराबरी के आधार’ पर बातचीत कर रहा है। हालांकि, कूटनीतिज्ञों का मानना है कि तेहरान पर मेज पर बैठने का सबसे बड़ा कारण ‘आर्थिक दबाव’ है। अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी ने ईरानी तेल निर्यात को लगभग ठप कर दिया है, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है।
ईरान के सामने सबसे बड़ा संकट
ईरान के लिए यह समझौता न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने का जरिया है, बल्कि अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने की कोशिश भी है। नाकेबंदी की वजह से ईरान को भारी वित्तीय घाटा हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह ‘फ्रेमवर्क डील’ सफल रहती है, तो यह 2026 की सबसे बड़ी वैश्विक घटना होगी, जो मिडिल ईस्ट का नक्शा और भविष्य दोनों बदल देगी।
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