
इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में वीडियो बनाना और यूट्यूब पर कंटेंट क्रिएट करना आज के युवाओं के लिए एक बड़ा और फुल-टाइम करियर बन चुका है। लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान में कंटेंट क्रिएटर्स और यूट्यूबर्स के लिए एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने उनकी चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं। पाकिस्तान की प्रमुख संघीय सरकारी एजेंसी फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (FBR) ने एक नया प्रस्ताव तैयार किया है, जिसके तहत यूट्यूबर्स पर उनकी वास्तविक कमाई के बजाय उनके वीडियो को कितनी बार देखा गया है (यानी वीडियो व्यूज के आधार पर) टैक्स लगाने की बात कही जा रही है।
सरकार की इस नई योजना की खबर बाहर आते ही डिजिटल मीडिया और इंटरनेट पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विशेषज्ञों और कंटेंट क्रिएटर्स का कहना है कि अगर सरकार जमीनी हकीकत को समझे बिना सिर्फ व्यूज गिनकर टैक्स वसूलेगी, तो बहुत से यूट्यूबर्स को अपनी असली कमाई से भी कहीं ज्यादा टैक्स सरकार के खाते में जमा करना पड़ सकता है। ‘मालदीव इनसाइट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, एफबीआर के इस कदम से ऑनलाइन मोनेटाइजेशन (इंटरनेट से होने वाली कमाई) की हकीकत और टैक्स लगाने वाली एजेंसी की समझ के बीच एक बड़ा अंतर खुलकर सामने आ गया है।
विरोध की मुख्य वजह: क्यों व्यूज का मतलब हमेशा कमाई नहीं होता?
इस नए नियम का विरोध करने वाले लोगों और डिजिटल एक्सपर्ट्स का तर्क बेहद सीधा और व्यावहारिक है। उनका कहना है कि यूट्यूब पर मिलने वाले व्यूज कभी भी किसी क्रिएटर की तय और पक्की कमाई की गारंटी नहीं होते।
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है:
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पहला पहलू (विज्ञापनों की संख्या): मान लीजिए किसी यूट्यूबर के वीडियो पर 10 लाख व्यूज आए, लेकिन उस वीडियो पर विज्ञापन बहुत कम चले या दर्शकों ने उन्हें स्किप (Skip) कर दिया, तो उस वीडियो से होने वाली वास्तविक कमाई बेहद कम होगी।
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दूसरा पहलू (दर्शकों का देश): अगर किसी दूसरे यूट्यूबर के वीडियो पर भी 10 लाख ही व्यूज आते हैं, लेकिन उसके वीडियो को देखने वाले लोग अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप जैसे विकसित देशों में बैठे हैं, तो उसकी कमाई पाकिस्तान या भारत में देखे जाने वाले वीडियो के मुकाबले कई गुना ज्यादा होगी।
यही कारण है कि दुनिया भर में टैक्स हमेशा किसी भी व्यक्ति या बिजनेस की शुद्ध आय (Net Income) पर लगाया जाता है, न कि केवल उसके काम को देखने वाले लोगों की संख्या पर।
यूट्यूब मोनेटाइजेशन का असली गणित: क्या होता है CPM?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूट्यूब का रेवेन्यू मॉडल किसी तय सैलरी की तरह काम नहीं करता। क्रिएटर्स की कमाई मुख्य रूप से उनके वीडियो के साथ दिखाए जाने वाले विज्ञापनों से होती है, जिसे तकनीकी भाषा में सीपीएम (CPM – Cost Per Mille) कहा जाता है। इसका मतलब होता है कि हर 1,000 व्यूज पर विज्ञापनों के जरिए कितनी कमाई हो रही है।
यूट्यूब पर अलग-अलग कंटेंट और मार्केट के हिसाब से यह कमाई कितनी बदल जाती है, इसे आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:
| कंटेंट / मार्केट का प्रकार | प्रति 1,000 व्यूज पर संभावित कमाई (CPM) | स्थिति की हकीकत |
| लो-डिमांड मार्केट / सामान्य कंटेंट | $1 (लगभग) | स्थानीय दर्शकों और सामान्य विषयों पर बनने वाले वीडियो, जहां विज्ञापन की दरें कम होती हैं। |
| हाई-डिमांड मार्केट / प्रीमियम कंटेंट | $30 से अधिक | टेक, फाइनेंस या बिजनेस से जुड़े वीडियो जिन्हें अमेरिका या यूरोपीय देशों में ज्यादा देखा जाता है। |
| शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट (YouTube Shorts) | $0.4 से $0.6 | छोटे वीडियो पर व्यूज तो करोड़ों में आते हैं, लेकिन उन पर मिलने वाला पैसा बहुत ही कम होता है। |
कमाई से ज्यादा टैक्स होने का खतरा
इस पूरे विवाद के बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कुछ विदेशी पाकिस्तानी कंटेंट क्रिएटर्स के लिए इस नए नियम के तहत टैक्स की दर 66 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। यह आंकड़ा न केवल सरकार के एक बहुत ही आक्रामक रुख को दिखाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि पॉलिसी बनाने वाले अधिकारियों और डिजिटल कमाई के तौर-तरीकों के बीच कितनी बड़ी व्यावहारिक दूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि टैक्स को असल कमाई के बजाय सिर्फ व्यूज की संख्या से जोड़ दिया गया, तो देश में एक ऐसी अजीब और डरावनी स्थिति पैदा हो जाएगी जहां एक क्रिएटर की कुल कमाई कम होगी और उसके ऊपर सरकार का टैक्स का कर्ज ज्यादा हो जाएगा। ऐसे में प्रभावी टैक्स दर पूरी तरह से असंगत हो जाएगी, जिससे तंग आकर कई बड़े और उभरते हुए क्रिएटर्स इस प्लेटफॉर्म को हमेशा के लिए छोड़ सकते हैं, जो डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा।
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