News India Live, Digital Desk: देश में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के कानून बनने के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह वास्तव में जमीन पर कब उतरेगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महिला आरक्षण का रास्ता संसद की सीटों में होने वाले एक बड़े इजाफे से होकर गुजरता है? संविधान का अनुच्छेद 81 (Article 81) इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाला है। विशेषज्ञों की मानें तो अगले परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़कर 850 के पार पहुंच सकती है। यदि ऐसा होता है, तो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा बदलाव होगा।
क्या है आर्टिकल 81 और क्यों है यह इतना खास?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना और सीटों के आवंटन का निर्धारण करता है। इसके तहत देश की जनसंख्या के अनुपात में सीटों का बंटवारा किया जाता है। वर्तमान में जो 543 सीटें हैं, वे 1971 की जनगणना पर आधारित हैं। साल 2026 तक सीटों की संख्या पर लगी पाबंदी (Freeze) हटने वाली है। इसके बाद होने वाले नए परिसीमन में जनसंख्या के नए आंकड़ों का इस्तेमाल होगा। चूंकि पिछले 5 दशकों में आबादी तेजी से बढ़ी है, इसलिए आर्टिकल 81 के प्रावधानों के तहत सीटों का दोबारा निर्धारण अनिवार्य हो जाएगा।
850 सीटों का फॉर्मूला: उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत
विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, नई जनगणना के बाद जब सीटों का पुनर्गठन होगा, तो लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 848 से 850 के करीब पहुंच सकती है। इस विस्तार में सबसे ज्यादा फायदा उन राज्यों को मिलेगा जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है, जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार। उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या 80 से बढ़कर 140 के पार जा सकती है। हालांकि, दक्षिण भारतीय राज्य इस गणित को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण के उनके सफल प्रयासों के बावजूद वहां सीटों में उत्तर के मुकाबले कम बढ़ोतरी होने की संभावना है।
महिला आरक्षण और परिसीमन का गहरा कनेक्शन
नारी शक्ति वंदन अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इसे जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू किया जाएगा। कानून के मुताबिक, कुल सीटों की 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यदि लोकसभा की सीटें बढ़कर 850 होती हैं, तो करीब 280 सीटें महिलाओं के खाते में जाएंगी। यानी, संसद का नया स्वरूप न केवल संख्या बल में बड़ा होगा, बल्कि इसमें महिलाओं की भागीदारी भी ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच जाएगी। सरकार के लिए चुनौती अब समय पर जनगणना और निष्पक्ष परिसीमन प्रक्रिया को संपन्न कराने की है।
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