
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई महीनों से जारी खूनी संघर्ष को खत्म करने की कोशिशों को एक बहुत बड़ा झटका लगा है। जब पूरी दुनिया यह उम्मीद कर रही थी कि दोनों महाशक्तियां जल्द ही युद्धविराम के समझौते पर दस्तखत कर देंगी, ठीक उसी वक्त मिडिल ईस्ट के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बारूद फिर से सुलग उठा है। अमेरिकी सेना ने पिछले 48 घंटों के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास स्थित ईरानी सैन्य ठिकानों पर दूसरा बड़ा हमला कर दिया है। इस अचानक हुए हमले के बाद ईरान आगबबूला हो गया है और उसने इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों और संघर्षविराम का खुला उल्लंघन बताते हुए अमेरिका को बेहद गंभीर अंजाम भुगतने की चेतावनी दी है।
मार्को रुबियो के दावे के तुरंत बाद भड़की आग, एक-दो दिनों में होने वाला था ऐतिहासिक समझौता
यह ताजा और भीषण टकराव एक ऐसे मोड़ पर हुआ है जब पूरी दुनिया शांति की उम्मीद लगाए बैठी थी। दरअसल, इस हमले से ठीक पहले नई दिल्ली में मौजूद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने मीडिया से बातचीत में एक बड़ा दावा किया था। उन्होंने कहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए एक ऐतिहासिक समझौता लगभग तैयार हो चुका है और अगले एक से दो दिनों के भीतर इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है। रुबियो के मुताबिक, दोनों देशों के वार्ताकार अब केवल समझौते के ड्राफ्ट में लिखे एक शब्द या वाक्य के आपसी मतभेदों को सुलझाने के अंतिम चरण में थे, लेकिन इस नए हमले ने पूरी शांति वार्ता पर ग्रहण लगा दिया है।
अमेरिका ने कहा- आत्मरक्षा में की कार्रवाई, ईरान का दावा- मार गिराया अमेरिकी MQ-9 ड्रोन
इस बड़े सैन्य हमले को लेकर वाशिंगटन और तेहरान की तरफ से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह हमला कोई उकसावे की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा पिछले 24 घंटों में किए गए मिसाइल, ड्रोन और छोटी लड़ाकू नावों के हमलों का एक करारा और सीधा जवाब था। पेंटागन का आरोप है कि ईरानी नौसेना समुद्र में खतरनाक बारूदी सुरंगें (Naval Mines) बिछा रही थी जो अमेरिकी जहाजों के लिए बड़ा खतरा थीं। इसके उलट, ईरान की IRGC ने एक सनसनीखेज दावा करते हुए कहा है कि उसने होर्मुज के आसमान में अमेरिकी सेना के एक बेहद आधुनिक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है और अमेरिका के सबसे खतरनाक F-35 लड़ाकू विमान को अपनी सीमा से खदेड़ दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप की इन दो नई शर्तों से भड़का ईरान, कतर और सऊदी अरब ने भी बनाई दूरी
राजनयिक सूत्रों के अनुसार, इस शांति समझौते के खटाई में पड़ने की असली वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ऐन वक्त पर थोपी गई दो बेहद सख्त और नई शर्तें हैं। ट्रंप की पहली शर्त यह है कि कतर, सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे बड़े मुस्लिम देश तुरंत इजरायल के साथ शांति समझौते (अब्राहम अकॉर्ड्स) का हिस्सा बनें। हालांकि, अरब देशों के एक सीनियर अधिकारी ने ट्रंप की इस पैकेज डील को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि इस वक्त पहली प्राथमिकता युद्ध को रोकना और बंद पड़े होर्मुज मार्ग को दोबारा चालू करना होना चाहिए, न कि राजनीतिक समझौते थोपना।
ट्रंप की दूसरी और सबसे विवादित शर्त ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने मांग रखी है कि ईरान के भीतर मौजूद सारा संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) का स्टॉक या तो तुरंत अमेरिका के हवाले कर दिया जाए या फिर उसे अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग की कड़ी निगरानी में हमेशा के लिए नष्ट कर दिया जाए। ईरान इस शर्त को अपनी संप्रभुता पर सीधे हमले के तौर पर देख रहा है और उसने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया है।
सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई की पहली सोशल मीडिया धमकी, कहा- अब चक्र पीछे नहीं लौटेगा
इस बेहद नाजुक और तनावपूर्ण माहौल के बीच ईरान के नए और सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई ने सोशल मीडिया पर आकर अमेरिका को सीधी और खुली चुनौती दे दी है। अपने दिवंगत पिता की जगह सत्ता संभालने के बाद से मुजतबा खामेनेई सार्वजनिक रूप से बहुत कम देखे गए हैं, लेकिन इस बार उन्होंने मोर्चा संभालते हुए लिखा कि वक्त का पहिया अब कभी पीछे नहीं लौटेगा। उन्होंने वाशिंगटन को चेतावनी देते हुए साफ कहा कि मिडिल ईस्ट के देश अब अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बचाने के लिए किसी ढाल या मोहरे की तरह इस्तेमाल होने को तैयार नहीं हैं।
गौरतलब है कि अगर दोनों देशों के बीच इन शर्तों पर सहमति बन जाती है, तो यह विनाशकारी युद्ध समाप्त हो सकता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का वह वैश्विक व्यापारिक मार्ग फिर से खुल जाएगा जिसे ईरान ने पूरी तरह ब्लॉक कर रखा है। फिलहाल 8 अप्रैल से लागू अस्थायी संघर्षविराम अब पूरी तरह बेअसर साबित हो चुका है और दुनिया एक बार फिर एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध के मुहाने पर आकर खड़ी हो गई है।
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