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80% भारतीय मांसाहारी हैं’, ब्रिक्स डिनर के शुद्ध शाकाहारी मेन्यू पर राहुल गांधी के बयान से मचा सियासी भूचाल

भारतीय राजनीति के गलियारों में खाने की थाली और खानपान की संस्कृति को लेकर अक्सर तीखी बयानबाजी देखने को मिलती है, लेकिन इस बार मामला देश के सर्वोच्च कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से जुड़ा होने के कारण काफी तूल पकड़ चुका है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान परोसे गए वेज यानी शुद्ध शाकाहारी भोजन के मेन्यू को लेकर दिए गए एक बयान ने देश की राजनीतिक फिजा में गर्माहट ला दी है। राहुल गांधी ने अपने हालिया बयान में यह तंज कसा था कि भारत की एक बहुत बड़ी आबादी यानी लगभग 80 प्रतिशत लोग मांसाहारी भोजन करते हैं, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंचों या विशिष्ट आयोजनों में केवल शाकाहारी भोजन परोसना देश के बहुसंख्यक खानपान के विविध स्वरूप को पूरी तरह से नहीं दर्शाता है। उनके इस बयान के सामने आते ही सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के नेताओं की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं, और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी पर कड़ा पलटवार करते हुए इसे भारतीय संस्कृति, परंपरा और विविधता को आहत करने वाला बयान करार दिया है, जिससे देश भर में एक नया राजनीतिक संग्राम छिड़ गया है।

राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब भारत दुनिया भर के देशों के साथ कूटनीतिक और सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करने के लिए वैश्विक मंचों पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। राहुल गांधी ने अपने भाषण या बातचीत के दौरान यह रेखांकित करने की कोशिश की थी कि भारत एक बहुसांस्कृतिक और विविध देश है जहां विभिन्न खानपान की आदतें मौजूद हैं, और किसी एक विशेष जीवनशैली को ही राष्ट्रीय पहचान के रूप में पेश करना पूरी तस्वीर नहीं है। उनके इस तर्क के पीछे भले ही सामाजिक विविधता का हवाला देने की मंशा रही हो, लेकिन आलोचकों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने इसे तुरंत लपक लिया। बीजेपी और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने इसे हिंदू संस्कृति और शाकाहारी परंपराओं के खिलाफ एक सोची-समझी टिप्पणी के रूप में पेश किया, जिसके बाद सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक हर जगह इसी बात की चर्चा होने लगी कि आखिर एक नेता को किसी आधिकारिक राजकीय भोज या मेन्यू पर टिप्पणी करने की क्या जरूरत थी।

राहुल गांधी के इस बयान पर सबसे कड़ा प्रहार करते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया और प्रेस के माध्यम से बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। किरेन रिजिजू ने पलटवार करते हुए कहा कि राहुल गांधी को हर बात में राजनीति करने और देश की सांस्कृतिक विविधता को तोड़ने की आदत पड़ चुकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स या किसी भी अन्य अंतरराष्ट्रीय राजकीय भोज (State Banquet) में परोसा जाने वाला भोजन मेहमानों की प्राथमिकताओं, विशिष्ट स्वास्थ्य मानकों, अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल और आतिथ्य सत्कार के सार्वभौमिक नियमों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है, न कि किसी क्षेत्रीय या राजनीतिक एजेंडे के तहत। रिजिजू ने यह भी कहा कि भारत में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के खानपान का सम्मान किया जाता है, लेकिन ऐसे संवेदनशील और प्रतिष्ठित वैश्विक आयोजनों को अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए इस्तेमाल करना विपक्ष की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। उनके इस जोरदार जवाब ने सत्ता पक्ष के समर्थकों के बीच राहुल गांधी के खिलाफ माहौल को और अधिक गर्मा दिया है।

यदि तथ्यात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां खानपान की विविधता सबसे अधिक है, और यहां विभिन्न राज्यों व समुदायों में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के व्यंजनों का बड़े पैमाने पर सेवन किया जाता है। हालांकि, जब बात अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, राष्ट्रपति भवन या प्रधानमंत्री स्तर पर आयोजित होने वाले राजकीय भोज की आती है, तो वहां मेन्यू का निर्धारण करते समय कई प्रकार की बातों का ध्यान रखा जाता है। इसमें आने वाले विदेशी मेहमानों की पसंद, उनके धर्म, शाकाहारी-निरामिष संबंधी पाबंदियां, स्वास्थ्य संबंधी दिशानिर्देश और सबसे बढ़कर देश की सात्विक व पारंपरिक पाक कला (Culinary Heritage) की सर्वश्रेष्ठ छवि को दुनिया के सामने रखना शामिल होता है। शाकाहारी भोजन को भारतीय संस्कृति में शुद्धता, सादगी और अहिंसा का प्रतीक माना जाता है, और जब विदेशी मेहमानों को पारंपरिक भारतीय व्यंजन परोसे जाते हैं, तो वह भारत की सांस्कृतिक मृदु शक्ति (Soft Power) का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में इस तरह के भोजन को किसी एक वर्ग विशेष से जोड़कर देखना कूटनीतिक रूप से भी अपरिपक्व माना जा रहा है।

खाद्य संस्कृति और राजनीति का यह नया विवाद एक बार फिर से इस बात को साबित करता है कि भारत में हर छोटी-बड़ी बात को चुनावी चश्मे से देखने की एक पुरानी परंपरा बन चुकी है। आम जनता के बीच भी इस मुद्दे को लेकर बंटी हुई प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक धड़े का मानना है कि नेताओं को देश के गंभीर मुद्दों जैसे कि बेरोजगारी, महंगाई और विकास पर ध्यान देना चाहिए, न कि इस बात पर बहस करनी चाहिए कि डिनर की थाली में क्या परोसा गया। वहीं दूसरी तरफ, राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस तरह के बयान ध्रुवीकरण की राजनीति को हवा देते हैं और जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाने का काम करते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यह विवाद यहीं थम जाता है या चुनाव नजदीक आते-आते राजनीतिक दल इस प्रकार के सांस्कृतिक और खानपान से जुड़े मुद्दों को और अधिक तूल देकर जनता के बीच एक नया राजनीतिक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश करते हैं।