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35 की उम्र पार करते ही तेजी से घटने लगती है हड्डियों की ताकत: ऑस्टियोपोरोसिस और जोड़ों के दर्द से बचना है तो आज ही अपनाएं ये जरूरी आदतें, बुढ़ापे तक मजबूत रहेंगे जोड़

मानव शरीर की संरचना में हड्डियां वह मजबूत ढांचा हैं जो हमें गतिशीलता, संतुलन और आंतरिक अंगों को सुरक्षा प्रदान करती हैं। आमतौर पर बीस और पच्चीस की उम्र तक हमारी हड्डियां अपने सबसे मजबूत दौर यानी पीक बोन मास (Peak Bone Mass) पर होती हैं। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति 35 वर्ष की आयु का पड़ाव पार करता है, शरीर में हड्डियों के निर्माण की गति धीमी पड़ने लगती है और हड्डियों का क्षरण यानी बोन लॉस तेजी से होने लगता है। यदि समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या आगे चलकर ऑस्टियोपेनिया और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों में बदल जाती है, जिससे मामूली चोट पर भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।

30 से 35 की उम्र के बाद शरीर में हार्मोनल बदलाव शुरू हो जाते हैं। विशेष रूप से महिलाओं में एस्ट्रोजन और पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के स्तर में आने वाला क्रमिक उतार-चढ़ाव हड्डियों की खनिज संरचना (Bone Mineral Density) को प्रभावित करता है। इसके अलावा, आजकल की सेडेंटरी लाइफस्टाइल, धूप की कमी, लगातार कई घंटे एक ही जगह बैठकर काम करना, और जंक फूड का अत्यधिक सेवन हड्डियों से कैल्शियम को सोखने की शरीर की क्षमता को बेहद कमजोर बना देता है। इसका सीधा असर घुटनों के दर्द, पीठ दर्द, कंधों की अकड़न और जल्दी थकान के रूप में दिखने लगता है।

हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम सबसे बुनियादी पोषक तत्व है, लेकिन 35 के बाद केवल एक गिलास दूध पीना पर्याप्त नहीं होता। अपने दैनिक भोजन में विविध प्रकार के कैल्शियम स्रोतों को शामिल करना बेहद जरूरी है:

  • डेयरी उत्पाद: गाय या भैंस का ताजा दूध, दही, पनीर और छाछ का नियमित सेवन करें। दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स आंतों के स्वास्थ्य को सुधारकर पोषक तत्वों का अवशोषण बढ़ाते हैं।

  • हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई और ब्रोकली में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और मैग्नीशियम पाया जाता है।

  • तिल और चिया सीड्स: सफेद और काले तिल कैल्शियम के सबसे समृद्ध स्रोत माने जाते हैं। रोजाना एक चम्मच भुने हुए तिल का सेवन हड्डियों के घनत्व को बनाए रखने में चमत्कारी भूमिका निभाता है।

  • रागी (मडुआ): मोटे अनाजों में रागी कैल्शियम का पावरहाउस है। गेहूं के आटे में रागी मिलाकर रोटी बनाएं या रागी का डोसा खाएं।

  • मेवे और बीज: बादाम, अखरोट, कद्दू के बीज और अलसी में कैल्शियम के साथ-साथ ओमेगा-3 फैटी एसिड होते हैं, जो जोड़ों की सूजन को कम करते हैं।

आप चाहे जितना भी कैल्शियम युक्त भोजन खा लें, लेकिन अगर आपके शरीर में विटामिन डी का स्तर कम है, तो आंतें उस कैल्शियम को सोखने में असमर्थ रहेंगी। भारतीय मौसम में सुबह की हल्की धूप में रोजाना 15 से 20 मिनट बिताना विटामिन डी प्राप्त करने का सबसे प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है। इसके साथ ही विटामिन K2 हड्डियों में कैल्शियम को सही जगह यानी दांतों और हड्डियों तक पहुंचाने का काम करता है, ताकि वह धमनियों में जमा न हो। साल में कम से कम एक बार अपने विटामिन डी3 और बी12 के स्तर की जांच जरूर करवाएं और डॉक्टर की सलाह पर ही जरूरी सप्लीमेंट्स लें।

हड्डियों को मजबूत रखने के लिए शारीरिक व्यायाम उतना ही जरूरी है जितना कि सही खानपान। जब हम हड्डियों और मांसपेशियों पर थोड़ा दबाव डालते हैं, तो शरीर नई बोन सेल्स बनाने के लिए प्रेरित होता है।

  • ब्रिस्क वॉक और जॉगिंग: रोजाना कम से कम 30 से 40 मिनट तेज कदमों से पैदल चलना पैरों और रीढ़ की हड्डियों के लिए बेहद फायदेमंद है।

  • स्ट्रेंथ ट्रेनिंग: हल्के डंबल्स के साथ व्यायाम, बॉडीवेट स्क्वैट्स और पुश-अप्स मांसपेशियों के साथ-साथ हड्डियों को घनत्व प्रदान करते हैं।

  • योगासन: ताड़ासन, वीरभद्रासन (वॉरियर पोज), त्रिकोणासन और भुजंगासन जैसे योग मुद्राएं रीढ़, कूल्हों और जोड़ों के लचीलेपन और संतुलन को बेहतरीन बनाती हैं।

हड्डियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए कुछ चीजों से दूरी बनाना बेहद अनिवार्य है। अत्यधिक नमक (सोडियम) का सेवन पेशाब के रास्ते कैल्शियम को शरीर से बाहर निकाल देता है। इसके अलावा, कैफीन युक्त पेय पदार्थ जैसे दिन में कई कप चाय-कॉफी, कार्बोनेटेड सॉफ्ट ड्रिंक्स और पैकेटबंद प्रोसेस्ड स्नैक्स हड्डियों की डेंसिटी को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं। धूम्रपान (स्मोकिंग) और अत्यधिक शराब का सेवन हड्डियों की नई कोशिकाओं के विकास को पूरी तरह बाधित कर देता है, इसलिए 35 की उम्र के बाद इन आदतों पर तुरंत नियंत्रण लगाना बेहद आवश्यक है।

35 की उम्र के बाद जोड़ों से कट-कट की आवाज आना, लगातार पीठ में खिंचाव रहना या हल्की सी ठोकर पर तेज दर्द महसूस होना खतरे की घंटी हो सकता है। ऐसे लक्षणों को कभी सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज न करें। अपने ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से परामर्श लेकर हर दो साल में एक बार डेक्सा स्कैन (DEXA Scan) जरूर करवाएं। यह टेस्ट आपकी हड्डियों के वास्तविक घनत्व का सटीक आंकड़ा देता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस की शुरुआती अवस्था में ही सही इलाज, लाइफस्टाइल बदलाव और डाइट प्लान के जरिए समस्या को गंभीर होने से रोका जा सकता है।