1962 से अब तक का ऐतिहासिक सफर: 440 स्पेस स्टार्टअप्स के साथ ग्लोबल पावर बना भारत, जानिए गगनयान और अंतरिक्ष स्टेशन का बड़ा अपडेटमेटा डिस्क्रिप्शन:India Space Journey 1962 to 2026: 1962 में थुम्बा से शुरू हुआ भारतीय अंतरिक्ष सफर आज 440 स्पेस स्टार्टअप्स और

साल 1962 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा और डॉ. विक्रम साराभाई की दूरदर्शिता के साथ शुरू हुआ भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम आज छह दशकों के सफर के बाद दुनिया के सबसे शक्तिशाली और आधुनिक अंतरिक्ष ईकोसिस्टम के रूप में स्थापित हो चुका है। केरल के थुम्बा से साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट के पुर्जे ढोने से शुरू हुआ यह सफर आज करीब 440 पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप्स और 9 अरब डॉलर (USD 9 Billion) की एक विशाल अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का रूप ले चुका है। सरकारी नियंत्रण से निकलकर निजी भागीदारी और वैश्विक नवाचार का केंद्र बने भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब मानव मिशन ‘गगनयान’ और अपना स्वयं का ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (BAS) स्थापित करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बढ़ा रहा है।

1962 से अब तक: थुम्बा के साउंडिंग रॉकेट से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक का सफर

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव 1962 में ‘इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च’ (INCOSPAR) के गठन के साथ पड़ी थी। इसके बाद 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना हुई।

1975 में पहले स्वदेशी उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ के सफल प्रक्षेपण से लेकर इनसैट (INSAT), पीएसएलवी (PSLV) और एलवीएम-3 (LVM3) जैसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यानों के निर्माण ने भारत को उपग्रह प्रक्षेपण का वैश्विक हब बना दिया। चंद्रयान-1 द्वारा चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज, मंगलयान (Mangalyaan) की ऐतिहासिक पहली ही कोशिश में सफलता और 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग ने भारत को दुनिया के शीर्ष अंतरिक्ष देशों की कतार में सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया।

440 स्पेस स्टार्टअप्स और निजी क्षेत्र की ऐतिहासिक क्रांति

अंतरिक्ष क्षेत्र में हुए ऐतिहासिक सुधारों और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) के गठन के बाद देश में निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स की बाढ़ आ गई है।

  • स्टार्टअप्स का विस्तार: साल 2014 में देश में केवल 1 स्पेस स्टार्टअप था, जो आज बढ़कर लगभग 440 स्टार्टअप्स तक पहुंच चुका है।

  • निजी निवेश में उछाल: निजी स्पेस सेक्टर में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) नियमों के उदारीकरण और ₹1,000 करोड़ के वेंचर कैपिटल फंड के सहयोग से निजी निवेश 600 मिलियन डॉलर से अधिक का आंकड़ा छू चुका है।

  • निजी रॉकेट और सैटेलाइट्स: अग्निकुल कॉस्मॉस, स्काईरूट एयरोस्पेस, पिक्सल और ध्रुव स्पेस जैसे भारतीय स्टार्टअप्स अब खुद के रॉकेट लॉन्च करने और पृथ्वी अवलोकन (Earth Observation) सैटेलाइट समूह स्थापित करने में सक्षम हो चुके हैं।

गगनयान मिशन का ताजा अपडेट: अंतरिक्ष में भारत की पहली मानव उड़ान

भारत के महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम ‘गगनयान’ (Gaganyaan) का बजट ₹20,193 करोड़ तक विस्तारित किया जा चुका है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य 3 भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों (गगनयात्रियों) को पृथ्वी की 400 किलोमीटर की निचली कक्षा (LEO) में 3 दिनों के लिए भेजना और उन्हें सुरक्षित रूप से समुद्र में वापस उतारना है।

मिशन के तहत पहले मानवरहित (Uncrewed) प्रायोगिक परीक्षण में महिला रोबोट ‘व्योममित्र’ (Vyommitra Half-Humanoid) को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा ताकि क्रू मॉड्यूल की लाइफ सपोर्ट और सुरक्षा प्रणालियों की सटीक जांच हो सके। इसके बाद आगामी चरणों में भारतीय वायुसेना के चयनित अंतरिक्ष यात्री तिरंगे के साथ अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे।

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS): 2035 तक कक्षा में स्थापित होगा देश का स्पेस लैब

रूस, अमेरिका और चीन के बाद अपनी खुद की स्पेस लैब संचालित करने वाला भारत दुनिया का चौथा देश बनने की राह पर है। केंद्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (BAS) एक 52 टन वजनी अत्याधुनिक 5-मॉड्यूल स्टेशन होगा, जो पृथ्वी की कक्षा में 400-450 किमी की ऊंचाई पर चक्कर लगाएगा।

  • पहला मॉड्यूल (BAS-01): भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के पहले बेस मॉड्यूल (BAS-01) को वर्ष 2028 तक भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3 के जरिए अंतरिक्ष में लॉन्च करने का लक्ष्य तय किया गया है।

  • पूर्ण स्टेशन का संचालन: पूरे 5 मॉड्यूल वाले स्टेशन को वर्ष 2035 तक पूरी तरह चालू (Operational) कर दिया जाएगा।

  • माइक्रोग्रैविटी रिसर्च: यह स्टेशन भारतीय वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को अंतरिक्ष में दवाओं के निर्माण, जैविक प्रयोगों, सामग्री विज्ञान और भविष्य के चंद्रमा व मंगल अभियानों के लिए दीर्घकालिक मानव अनुसंधान का स्वतंत्र मंच प्रदान करेगा।

भारत का यह अंतरिक्ष सफर केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की रणनीतिक संप्रभुता, संचार, आपदा प्रबंधन और आगामी 10 वर्षों में स्पेस इकोनॉमी को 45 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का एक मजबूत और आत्मनिर्भर खाका है।