
भारत के आर्थिक और कॉरपोरेट इतिहास में साल 2016 एक युगांतकारी मोड़ साबित हुआ था, जब देश की संसद ने दशकों पुराने और बिखरे हुए दिवालिया कानूनों को खत्म करके ‘इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड’ (IBC) को लागू किया था। साल 2026 में जब यह ऐतिहासिक कानून अपने क्रियान्वयन का एक दशक पूरा कर रहा है, तब भारतीय अर्थव्यवस्था और बैंकिंग जगत के लिए इसका निष्पक्ष मूल्यांकन करना बेहद जरूरी हो जाता है। आईबीसी से पहले का दौर वह था जब कंपनियां दिवालिया हो जाती थीं लेकिन कंपनियों के प्रमोटर आलीशान बंगलों में रहते थे। सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज एक्ट (SICA), बीआईएफआर (BIFR), डीआरटी (DRT) और सरफेसी (SARFAESI) जैसे पुराने कानूनों के मकड़जाल में बैंकों का फंसा हुआ कर्ज निकालने में औसतन 6 से 8 साल लग जाते थे और अंत में बैंकों के हाथ केवल 15 से 20 प्रतिशत रकम ही लग पाती थी। भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के 10 साल के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस कानून ने पुराने ढर्रे को पूरी तरह पलट दिया है। मार्च 2026 तक आईबीसी के तहत राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) में कुल 8,987 से अधिक कॉर्पोरेट दिवाला मामलों को स्वीकार किया गया, जिनमें से करीब 7,100 से ज्यादा मामलों का अंतिम निपटारा किया जा चुका है। इस पूरी प्रक्रिया के जरिए वित्तीय लेनदारों (वित्तीय संस्थाओं और बैंकों) ने 4.32 लाख करोड़ रुपये से अधिक के फंसे हुए कर्ज की सफल वसूली की है।
आईबीसी की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल अदालतों के भीतर हुई वसूली नहीं है, बल्कि देश के कॉरपोरेट कल्चर में आया वह बुनियादी बदलाव है जिसने बकाएदारों के मन में कानून का खौफ पैदा किया। आईबीसी ने भारत में सदियों से चली आ रही ‘डेटर इन पजेशन’ (यानी कर्ज न चुकाने के बावजूद मालिक का कब्जा) वाली व्यवस्था को खत्म करके ‘क्रेडिटर्स इन कंट्रोल’ (लेनदारों का नियंत्रण) का क्रांतिकारी मॉडल स्थापित किया। संहिता की धारा 29A (Section 29A) ने विलफुल डिफॉल्टर्स और बकाएदार प्रमोटरों पर अपनी ही कंपनी को औने-पौने दाम में दोबारा खरीदने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रमोटरों के मन में यह खौफ बैठ गया कि यदि उन्होंने बैंकों का कर्ज नहीं चुकाया, तो कंपनी की कमान उनके हाथ से हमेशा के लिए छिन जाएगी। आईबीबीआई के अनुसार, आईबीसी के इसी ‘डिटेरेंस इफेक्ट’ (निवारक प्रभाव) के चलते एनसीएलटी में औपचारिक दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही (प्री-एडमिशन स्टेज पर) 30,000 से अधिक मामलों में बकाएदारों ने बैंकों के साथ खुद समझौता कर लिया। इन प्री-एडमिशन सेटलमेंट्स के जरिए लगभग 14 लाख करोड़ रुपये के दावों का निपटारा कोर्ट के बाहर ही हो गया। यह आंकड़ा साबित करता है कि आईबीसी ने देश में क्रेडिट अनुशासन (Credit Discipline) की एक नई कार्यसंस्कृति की नींव रखी है।
पिछले दशक के मध्य में भारतीय अर्थव्यवस्था ‘ट्विन बैलेंस शीट संकट’ (Twin Balance Sheet Problem) से जूझ रही थी—एक तरफ कॉरपोरेट कंपनियों के बहीखाते कर्ज के बोझ से दबे हुए थे, तो दूसरी तरफ सरकारी और निजी बैंक फंसे हुए कर्जों यानी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) के दलदल में धंस चुके थे। साल 2017-18 के दौरान भारतीय बैंकों का ग्रॉस एनपीए अनुपात बढ़कर 11.8 प्रतिशत के खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था, जिसके चलते बैंकों ने नए प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज देना लगभग बंद कर दिया था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की रिपोर्ट ऑन ट्रेंड एंड प्रोग्रेस ऑफ बैंकिंग के अनुसार, आईबीसी ने बैंकों की बैलेंस शीट को साफ करने में सबसे बड़ी और केंद्रीय भूमिका निभाई है। बैंकों द्वारा की जाने वाली कुल रिकवरी का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सीधे आईबीसी रूट से आने लगा। इस कड़े तंत्र के चलते आज देश के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का ग्रॉस एनपीए गिरकर 2.1 प्रतिशत के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ चुका है। आज भारतीय बैंक पूंजीगत रूप से इतने मजबूत और जोखिम-मुक्त हो चुके हैं कि वे भारत के आगामी इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और विनिर्माण क्षेत्र को बड़े पैमाने पर कर्ज देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
आईबीसी का मूल दर्शन कंपनियों को बंद करना या बेचना नहीं, बल्कि रुग्ण हो चुकी औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करना और उनमें काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के रोजगार को बचाना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘स्विस रिबन्स’ के ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि आईबीसी का प्राथमिक उद्देश्य कंपनी का रेजोल्यूशन (पुनरुद्धार) है, रिकवरी केवल उसका गौण परिणाम है। पिछले 10 वर्षों में कई ऐसी विशालकाय कंपनियां जिन्हें आर्थिक रूप से मृत मान लिया गया था, वे आज देश के उत्पादन तंत्र में नई जान फूंक रही हैं। एस्सार स्टील (Essar Steel) का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे आर्सेलरमित्तल (ArcelorMittal) ने अधिग्रहित किया और बैंकों को लगभग 90 प्रतिशत तक की अभूतपूर्व रिकवरी मिली। इसी तरह भूषण स्टील को टाटा स्टील ने, आलोक इंडस्ट्रीज को रिलायंस इंडस्ट्रीज ने और दीवान हाउसिंग फाइनेंस (DHFL) को पीरामल समूह ने अधिग्रहित करके पुनर्जीवित किया। आईआईएम अहमदाबाद के एक स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, आईबीसी के तहत रिवाइव की गई कंपनियों की औसत बिक्री में अगले 5 वर्षों में 89% की बढ़ोतरी देखी गई और उनके पूंजीगत खर्च (CapEx) में 106% का भारी उछाल आया। हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि बंद हुए कुल मामलों में से 3,000 से अधिक कंपनियां लिक्विडेशन (परिसमापन) में चली गईं। हालांकि, नियामकों का कहना है कि इनमें से 42% से अधिक कंपनियां ऐसी थीं जो आईबीसी में आने से पहले ही पूरी तरह बंद पड़ी थीं या पुरानी बीआईएफआर व्यवस्था से आई थीं, जिनके पास बचने का कोई ऑपरेशनल आधार नहीं था।
शानदार कामयाबियों के बावजूद, आईबीसी के 10 साल के सफर पर सबसे बड़ा काला धब्बा ‘समयसीमा का टूटना’ (Procedural Delays) रहा है। कानून बनाते समय संसद ने संकल्प लिया था कि किसी भी कंपनी के दिवाला समाधान की प्रक्रिया 180 दिनों के भीतर पूरी होगी, जिसे कानूनी विवादों के साथ अधिकतम 330 दिनों के भीतर हर हाल में खत्म करना अनिवार्य होगा। लेकिन आज की जमीनी हकीकत इस वैधानिक मियाद की धज्जियां उड़ाती नजर आती है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में आईबीसी के तहत किसी मामले को सुलझाने में औसतन 744 दिन का समय लग रहा है, जो तय सीमा से दोगुने से भी अधिक है। कई हाई-प्रोफाइल मामलों में तो यह प्रक्रिया 1,000 से 1,200 दिनों तक खिंच गई। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) में जजों (न्यायिक और तकनीकी सदस्यों) की भारी कमी, लचर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और मुकदमेबाजी की अंतहीन प्रक्रिया है। जब कोई रेजोल्यूशन प्लान तैयार होता है, तो असंतुष्ट प्रमोटर, ऑपरेशनल क्रेडिटर्स या असफल बोलीदाता एनसीएलटी से लेकर एनसीएलएटी (NCLAT) और सुप्रीम कोर्ट तक अपीलों की झड़ी लगा देते हैं। जैसे-जैसे मुकदमे की तारीखें बढ़ती हैं, बंद पड़ी फैक्ट्रियों की मशीनें जंग खाने लगती हैं, कुशल कर्मचारी नौकरी छोड़कर चले जाते हैं और उस कंपनी की बाजार साख व संपत्ति की वास्तविक वैल्यू तेजी से खत्म हो जाती है।
आईबीसी की कार्यप्रणाली पर सबसे तीखा प्रहार संसदीय समितियों और वित्तीय विश्लेषकों द्वारा बैंकों द्वारा लिए जाने वाले भारी ‘हेयरकट’ (Haircut यानी बकाए कर्ज को माफ करना) को लेकर किया जाता रहा है। 10 वर्षों के कुल आंकड़ों का विश्लेषण करें तो बैंकों को अपने स्वीकृत दावों (Admitted Claims) पर औसतन केवल 30 से 35 प्रतिशत के आसपास ही वसूली मिल पाई है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि वित्तीय लेनदारों को 65 से 70 प्रतिशत तक का भारी नुकसान (हेयरकट) उठाना पड़ा है। कई चर्चित मामलों, जैसे वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज (Videocon) और शिवा इंडस्ट्रीज में तो हेयरकट 90 से 95 प्रतिशत तक पहुंच गया, जहां हजारों करोड़ के बकाए पर बैंकों को मात्र कुछ सौ करोड़ रुपये से संतोष करना पड़ा। इस पर उठने वाले सवालों के जवाब में आईबीबीआई और बैंकिंग विशेषज्ञों का तर्क है कि हेयरकट की तुलना बकाए क्लेम के बजाय संपत्ति के ‘लिक्विडेशन वैल्यू’ से की जानी चाहिए। आईबीसी के तहत हुई कुल 4.32 लाख करोड़ की वसूली परिसमापन मूल्य (Liquidation Value) का लगभग 167 प्रतिशत और फेयर वैल्यू का 95 प्रतिशत रही है। सीधे शब्दों में कहें तो यदि आईबीसी न होता और उन कंपनियों को कबाड़ के भाव बेचा जाता, तो बैंकों को जितना पैसा मिलता, आईबीसी के जरिए उससे 67% अधिक रकम हासिल हुई है। फिर भी, अत्यधिक हेयरकट सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और करदाताओं के पैसे की भारी बर्बादी का एक चिंताजनक बिंदु बना हुआ है।
अपने 10वें साल में कदम रखते हुए आईबीसी के सामने रियल एस्टेट और छोटे उद्योगों (MSME) से जुड़ी जटिलताएं सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हैं। जेपी इंफ्राटेक (Jaypee Infratech) और आम्रपाली जैसे मामलों ने दिखाया कि जब कोई रियल एस्टेट कंपनी दिवालिया होती है, तो वहां वित्तीय बैंकों के साथ-साथ अपनी गाढ़ी कमाई का घर बुक कराने वाले हजारों निर्दोष फ्लैट खरीदार (Homebuyers) भी फंस जाते हैं। सरकार ने कानून में संशोधन करके होमबायर्स को वित्तीय लेनदार का दर्जा तो दिया, लेकिन प्रोजेक्ट-वाइज रेजोल्यूशन की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं हो पाई है। इसके अतिरिक्त, छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए शुरू किया गया ‘प्री-पैकेज्ड इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस’ (PPIRP) प्रक्रिया की जटिलताओं के चलते अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया है।
अब समय आ गया है कि आईबीसी को अपने अगले दशक में ‘आईबीसी 2.0’ (IBC 2.0) के रूप में अपग्रेड किया जाए। इसके लिए एनसीएलटी की विशेष बेंचों की स्थापना, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल केस मैनेजमेंट के जरिए मुकदमों की त्वरित सुनवाई, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल्स (RPs) की जवाबदेही तय करने के कड़े कोड ऑफ कंडक्ट और क्रॉस-बॉर्डर इन्सॉल्वेंसी (विदेशी संपत्तियों के निपटारे) के आधुनिक कानूनों को तत्काल लागू करने की आवश्यकता है। पिछले 10 सालों में आईबीसी भले ही सभी कसौटियों पर शत-प्रतिशत खरा न उतरा हो, लेकिन इसने भारत में बकाएदारों की मनमानी को कुचलकर, बैंकिंग तंत्र को नई संजीवनी देकर और वैश्विक निवेश के लिए भारत की साख को मजबूत करके यह साबित कर दिया है कि यह आधुनिक स्वतंत्र भारत का सबसे साहसिक और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार है।
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