
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और मध्य पूर्व की भू-राजनीति से इस वक्त एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में शुमार सऊदी अरब अब अपनी तेल सुरक्षा को लेकर गहरे संकट और दहशत में नजर आ रहा है। लाल सागर और यमन के समुद्री इलाकों में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा लगातार किए जा रहे ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमलों से घबराकर सऊदी अरब ने अपनी रणनीति में एक बहुत बड़ा बदलाव किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी ‘अरामको’ अब अपनी मुख्य भूमि से दूर दक्षिण-पूर्व एशिया के देश सिंगापुर में अपने कच्चे तेल का विशाल भंडार तैयार करने जा रही है। दुनिया भर के ऊर्जा बाजार में इस कदम को सऊदी अरब द्वारा अपने मुख्य तेल ठिकानों और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरों से बचाव के रूप में देखा जा रहा है। इस सनसनीखेज फैसले के बाद से वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की रणनीतिक गणनाओं पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
सऊदी अरब के लिए लाल सागर और उससे जुड़े समुद्री रास्ते उसकी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी जीवन रेखा रहे हैं। दुनिया भर में तेल की सप्लाई करने वाले टैंकर इसी रास्ते से होकर गुजरते हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों में यमन के हूती विद्रोहियों ने जिस तरह से इस जलमार्ग को अपने हमलों का निशाना बनाया है, उसने खाड़ी देशों की नींद उड़ा दी है। हूतियों के पास मौजूद आधुनिक एंटी-शिप मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन जहाजों के लिए काल बनते जा रहे हैं। सऊदी अरब की अरामको जैसी दिग्गज कंपनियों के तेल प्रतिष्ठानों और रिफाइनरियों पर पहले भी कई बार ड्रोन हमले हो चुके हैं, जिससे उसकी उत्पादन क्षमता पर गंभीर संकट मंडराया है। अपनी घरेलू धरती पर इन हमलों की असुरक्षा और लगातार बढ़ते खतरे को देखते हुए ही सऊदी नेतृत्व ने अब देश के बाहर सुरक्षित ठिकानों पर अपने तेल के भंडार स्थापित करने का यह अभूतपूर्व और मजबूरन फैसला लिया है, ताकि किसी भी युद्ध या आपात स्थिति में उसकी तेल आपूर्ति पूरी तरह ठप न हो सके।
सऊदी अरब द्वारा अपने तेल के विशाल भंडार के भंडारण के लिए सिंगापुर को चुने जाने के पीछे बहुत ही गहरा और सोची-समझा आर्थिक व सामरिक गणित काम कर रहा है। सिंगापुर एशिया का एक ऐसा प्रमुख वित्तीय और व्यापारिक केंद्र है जो सुदूर पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों के बिल्कुल केंद्र में स्थित है। इसके अलावा सिंगापुर की राजनीतिक स्थिरता, उन्नत समुद्री बुनियादी ढांचा और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था निवेशकों और ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाती है। सऊदी अरामको इसके जरिए एशियाई देशों विशेषकर चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे विशाल बाजारों को बिना किसी बाधा के लगातार और तुरंत तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहती है। यदि मध्य पूर्व में हूतियों या ईरान के साथ किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध के कारण मुख्य समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो सिंगापुर में पहले से जमा तेल का यह भंडार सऊदी अरब को अरबों डॉलर का नुकसान होने से बचा सकता है और उसकी बाजार में साख बनाए रख सकता है।
चूंकि भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया और मुख्य रूप से सऊदी अरब से आयात करता है, इसलिए खाड़ी देशों की इस भू-राजनीतिक हलचल का सीधा असर नई दिल्ली पर भी पड़ना तय है। जब तेल उत्पादक देश अपनी ही सुरक्षा को लेकर इतने आशंकित हो जाते हैं और दूर-दराज के देशों में रिजर्व स्टॉक रखने लगते हैं, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में लॉजिस्टिक्स लागत और शिपिंग खर्च में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। हूती हमलों के कारण पहले ही जहाजों को केप ऑफ गुड होप का लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है जिससे समय और पैसा दोनों अधिक लग रहे हैं। हालांकि, सिंगापुर में सऊदी तेल का भंडार उपलब्ध होने से एशियाई खरीदारों को कई बार फौरन शिपमेंट मिलने में आसानी भी हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से मध्य पूर्व का यह अस्थिर माहौल भारत के लिए ऊर्जा मुद्रास्फीति और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का बड़ा जोखिम पैदा कर रहा है, जिस पर भारतीय नीति निर्माता पैनी नजर बनाए हुए हैं।
सऊदी अरब द्वारा सिंगापुर में तेल का भंडार बनाने की यह पहल इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आधुनिक युग में पारंपरिक युद्ध के तरीके बदल चुके हैं और अब गैर-राज्यीय ताकतें जैसे कि हूती विद्रोही भी वैश्विक महाशक्तियों और तेल दिग्गजों को अपनी चाल बदलने के लिए मजबूर कर रहे हैं। ईरान और उसके छद्म युद्ध समूहों की वजह से पश्चिम एशिया का पूरा सुरक्षा ढांचा चरमरा गया है। सऊदी अरब जैसे देश जो कभी अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत के बल पर अजेय माने जाते थे, आज वे अपनी ऊर्जा संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सीमाओं से बाहर शरण ढूंढ रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यह रणनीति सऊदी अरब को हूतियों के आतंक से बचा पाती है या फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक नए और खतरनाक आर्थिक संघर्ष की शुरुआत होती है। एक बात पूरी तरह साफ है कि दुनिया की ऊर्जा धुरी अब धीरे-धीरे भौगोलिक सुरक्षा और वैकल्पिक मार्गों की तलाश में नए समीकरणों की ओर तेजी से बढ़ रही है।
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