
दिल के दौरों (Heart Attack) से जूझने वाले मरीजों और हृदय रोगियों के लिए रिकवरी के दौरान सही पोषण और जीवनशैली का चयन बेहद अहम माना जाता है। हालिया वर्षों में कई तरह की मेडिकल रिसर्च और कार्डियोलॉजी अध्ययनों में यह बात प्रमुखता से सामने आई है कि शरीर में विटामिन डी (Vitamin D) का स्तर दिल की सेहत से सीधा संबंध रखता है। पहले हार्ट अटैक से गुजर चुके मरीजों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या विटामिन डी सप्लीमेंट्स (Vitamin D Supplements) लेने से दोबारा दिल का दौरा पड़ने या किसी गंभीर कार्डियक इवेंट का खतरा सच में कम हो जाता है। कार्डियोलॉजिस्ट और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस विषय पर अपनी वैज्ञानिक राय साझा करते हुए इसके फायदे और सही मात्रा को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने रखी हैं।
मानव शरीर में विटामिन डी न केवल हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है बल्कि यह रक्तचाप (Blood Pressure) को नियंत्रित करने, धमनियों (Arteries) की सूजन को कम करने और हृदय की मांसपेशियों (Heart Muscles) को सुचारू रूप से कार्य करने में भी बेहद अहम भूमिका निभाता है। मेडिकल साइंस के अनुसार जब किसी व्यक्ति को पहली बार हार्ट अटैक आता है तो उसकी हृदय की कोशिकाएं और धमनियां अत्यधिक तनाव में आ जाती हैं। शरीर में विटामिन डी की कमी से धमनियों में कड़ापन (Stiffness) बढ़ने लगता है और एंडोथेलियल फंक्शन प्रभावित होता है, जिससे दोबारा रक्त के थक्के (Blood Clots) बनने या ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ने का जोखिम बढ़ जाता है। इसी वजह से कार्डियोलॉजिस्ट पहले अटैक के बाद मरीज की प्रोफाइल में विटामिन डी की जांच अनिवार्य रूप से शामिल करते हैं।
अक्सर मरीज यह मान लेते हैं कि विटामिन डी की गोलियां या सप्लीमेंट्स खाने से वे दोबारा होने वाले हार्ट अटैक से पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगे। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कार्डियोलॉजी अध्ययनों और हालिया क्लीनिकल ट्रायल्स से यह बात साफ हुई है कि विटामिन डी सप्लीमेंट्स कोई सीधा जादुई सुरक्षा कवच नहीं हैं, लेकिन यदि किसी मरीज के शरीर में विटामिन डी की गंभीर कमी (Deficiency) है, तो उसे सप्लीमेंट के जरिए सामान्य स्तर पर लाना बेहद जरूरी होता है। शरीर में सही मात्रा में विटामिन डी का होना दिल की धमनियों की सूजन को कम करता है और कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ को मजबूती प्रदान करता है। विशेषज्ञों के अनुसार सप्लीमेंट्स का मुख्य काम कमी को पूरा कर हृदय प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव को रोकना है, जिससे परोक्ष रूप से दोबारा अटैक का जोखिम कम होता है।
किसी भी तरह के विटामिन सप्लीमेंट को खुद से या मेडिकल स्टोर से पूछकर सीधे खाना गंभीर खतरे का कारण बन सकता है। विटामिन डी एक फैट-सोल्युबल (Fat-soluble) विटामिन है, जिसका अर्थ है कि शरीर में इसकी अत्यधिक मात्रा जमा होकर टॉक्सिसिटी पैदा कर सकती है। यदि कोई हृदय रोगी बिना डॉक्टर की सलाह के रोजाना ओवरडोज सप्लीमेंट लेता है तो उसके रक्त में कैल्शियम का स्तर अचानक बढ़ (Hypercalcemia) सकता है। इससे धमनियों और किडनी में कैल्शियम का जमाव शुरू हो जाता है जो उल्टा दिल की सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए पहले अटैक के बाद सीरम 25-हाइड्रॉक्सीविटामिन डी टेस्ट कराने के बाद केवल डॉक्टर द्वारा बताई गई खुराक (Dose) का ही पालन करना चाहिए।
सप्लीमेंट्स के अलावा पहले हार्ट अटैक के बाद मरीजों को अपने दैनिक जीवन में प्राकृतिक तरीकों से विटामिन डी का स्तर बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए। सुबह की हल्की और गुनगुनी धूप (Morning Sunlight) में 15 से 20 मिनट बिताना विटामिन डी प्राप्त करने का सबसे असरदार तरीका है। इसके साथ ही अपनी डाइट में फैटी फिश जैसे सालमन व टूना, अंडे की जर्दी, फोर्टिफाइड दूध और मशरूम को शामिल करना फायदेमंद होता है। हृदय रोगियों को यह समझना होगा कि विटामिन डी का संतुलित स्तर, संतुलित आहार, डॉक्टर की सुझाई नियमित दवाएं, हल्का व्यायाम और तनावमुक्त जीवनशैली ही दोबारा आने वाले हार्ट अटैक के खतरे को प्रभावी ढंग से कम कर सकती है।
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