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हवाई सफर होगा महंगा या सस्ता? विमानों में SAF मिलाना होगा अनिवार्य; जानिए एयरलाइंस पर सख्ती और टिकट दरों पर पड़ने वाला असर

वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन घटाने और नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उड्डयन क्षेत्र में सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल यानी एसएएफ (Sustainable Aviation Fuel – SAF) का इस्तेमाल अनिवार्य करने की दिशा में कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। एसएएफ एक गैर-जीवाश्म (Non-fossil) आधारित हरित ईंधन है, जिसे मुख्य रूप से प्रयुक्त खाद्य तेल (Used Cooking Oil), कृषि अपशिष्ट (पॉली/पराली), शैवाल और गैर-खाद्य बायोमास से परिष्कृत करके तैयार किया जाता है। तकनीकी रूप से यह एक ‘ड्रॉप-इन’ फ्यूल है, जिसका अर्थ है कि इसे वर्तमान विमान इंजनों या मौजूदा एयरपोर्ट फ्यूलिंग सिस्टम में बिना किसी बदलाव के सीधे पारंपरिक एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के साथ मिश्रित करके उपयोग में लाया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के कॉर्शिया (CORSIA – Carbon Offsetting and Reduction Scheme for International Aviation) समझौते और भारत के राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप विमानन मंत्रालय ने चरणबद्ध ब्लेंडिंग का खाका तैयार किया है:

  • 2027 से 1% ब्लेंडिंग अनिवार्य: शुरुआती चरण में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए विमान ईंधन में कम से कम 1 प्रतिशत एसएएफ मिलाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।

  • 2028 में 2% का लक्ष्य: अगले चरण में इस अनुपात को बढ़ाकर 2 प्रतिशत तक ले जाने की रूपरेखा है।

  • 2030 तक 5% हिस्सेदारी: वर्ष 2030 तक अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर कुल एविएशन फ्यूल में 5 प्रतिशत ग्रीन फ्यूल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

  • घरेलू उड़ानों पर संभावित विस्तार: भविष्य में स्थानीय उत्पादन क्षमता और आपूर्ति श्रृंखला स्थिर होने के बाद इसे घरेलू उड़ानों के लिए भी अनिवार्य करने की योजना है।

यात्रियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस फैसले से उनकी जेब पर क्या असर पड़ेगा। जमीनी हकीकत यह है कि एसएएफ को अनिवार्य किए जाने से निकट भविष्य में हवाई यात्रा के सस्ते होने की कोई गुंजाइश नहीं है, बल्कि टिकट दरों में 2% से 5% तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है:

  1. पारंपरिक एटीएफ के मुकाबले 2 से 4 गुना महंगा: वर्तमान में उत्पादन सीमित होने और जटिल रिफाइनिंग तकनीक के कारण एसएएफ की कीमत सामान्य जेट फ्यूल की तुलना में दो से चार गुना अधिक है।

  2. ऑपरेटिंग कॉस्ट में फ्यूल की 30-40% हिस्सेदारी: किसी भी एयरलाइन के कुल परिचालन खर्च (Operating Cost) में अकेले विमान ईंधन की हिस्सेदारी लगभग 30 से 40 प्रतिशत होती है। जब ईंधन की मूल लागत बढ़ेगी, तो एयरलाइंस इसका बोझ अंततः पैसेंजर किराए पर ‘ग्रीन सेस’ (Green Surcharge) के रूप में डालेंगी।

  3. सख्त निगरानी और जुर्माना: नियमों का उल्लंघन करने या निर्धारित सीमा से कम ब्लेंडिंग करने वाली विमानन कंपनियों पर भारी कार्बन क्रेडिट देनदारी और आर्थिक दंड लगाने की तैयारी है, जिससे एयरलाइंस पर सख्त अनुपालन का दबाव रहेगा।

पहलू पारंपरिक एविएशन फ्यूल (ATF) सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF)
उत्पादन स्रोत कच्चा खनिज तेल (जीवाश्म ईंधन) प्रयुक्त तेल, बायोमास व कृषि अवशेष
कार्बन उत्सर्जन अत्यधिक उच्च (एविएशन सेक्टर का मुख्य प्रदूषण) लाइफसाइकिल में 70% से 80% तक कम उत्सर्जन
कीमत का अंतर आधार मानक मूल्य सामान्य एटीएफ से 2 से 4 गुना अधिक महंगा
इंजन संगतता मौजूदा तकनीक 100% ड्रॉप-इन (बिना इंजन मॉडिफिकेशन के मिश्रणीय)
टिकट किराए पर प्रभाव आधार किराया लंबी दूरी के अंतरराष्ट्रीय रूटों पर मामूली वृद्धि की आशंका

विमानन विशेषज्ञों के अनुसार, टिकट दरों में अत्यधिक उछाल को रोकने का एकमात्र उपाय देश के भीतर ही बड़े पैमाने पर एसएएफ का उत्पादन शुरू करना है। भारत की प्रमुख तेल विपणन कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) ने पानीपत और अन्य रिफाइनरियों में बायो-एटीएफ विनिर्माण संयंत्रों की स्थापना पर काम तेज कर दिया है। यदि केंद्र सरकार कच्चे माल (बायोमास) पर सब्सिडी, जीएसटी छूट और ‘सप्लाई-साइड इंसेंटिव’ प्रदान करती है, तो उत्पादन लागत नियंत्रित हो सकेगी, जिससे आम मुसाफिरों पर महंगे हवाई सफर का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।