
देशभर में हवाई टिकटों की अनियंत्रित और आसमान छूती कीमतों को लेकर आम यात्रियों के बीच लंबे समय से आक्रोश देखा जा रहा है। त्योहारों, छुट्टियों और आपातकालीन स्थितियों के दौरान विमानन कंपनियों द्वारा मनमाना किराया वसूलने की प्रवृत्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में एयरलाइंस द्वारा हवाई किराए में सात सौ प्रतिशत तक की अप्रत्याशित बढ़ोतरी को चुनौती दी गई थी। हालांकि देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मुद्दे पर न्यायिक दखल देने से साफ इनकार कर दिया है। सोमवार को हुई महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए मामले को खारिज कर दिया और स्पष्ट संकेत दिया कि कमर्शियल मार्केट से जुड़े किरायों के निर्धारण में न्यायपालिका का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बाद विमान यात्रा करने वाले मध्यमवर्गीय यात्रियों और बार-बार हवाई सफर करने वाले लोगों को बड़ा झटका लगा है। लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को हवाई किराए की एक ऊपरी सीमा तय करनी चाहिए ताकि निजी एयरलाइंस यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाकर मनमाना मुनाफा न कमा सकें। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस विषय को नीतिगत और बाजार आधारित व्यवस्था मानते हुए किसी भी तरह का राहत आदेश पारित करने से मना कर दिया, जिसके बाद विमानन क्षेत्र में किराए की डायनेमिक प्राइसिंग प्रणाली को लेकर बहस एक बार फिर से तेज हो गई है।
सोमवार को जब यह मामला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया, तो याचिकाकर्ता के वकील ने एयरलाइंस की मूल्य निर्धारण नीति पर कड़े सवाल उठाए। वकील ने अदालत में विभिन्न एयर रूट्स के आंकड़े पेश करते हुए दलील दी कि सामान्य दिनों की तुलना में पीक सीजन और त्योहारी मौकों पर हवाई किरायों में 700 प्रतिशत तक की बेतहाशा और अवास्तविक बढ़ोतरी कर दी जाती है। उन्होंने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि आधुनिक समय में हवाई यात्रा अब केवल विलासिता का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह समय की बचत और आपातकालीन परिस्थितियों के लिए एक आवश्यक सेवा बन चुकी है। टिकट की दरों में इस कदर असमान और मनमानी बढ़ोतरी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि इससे एक बड़ा तबका यात्रा के अधिकार से वंचित हो जाता है।
वकील की इन भावुक और कानूनी दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस विक्रम नाथ ने बेहद संक्षिप्त, तीखी और दो टूक प्रतिक्रिया दी। पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा, “हवाई यात्रा न करें। अगला मामला।” इस संक्षिप्त और सख्त टिप्पणी के साथ ही पीठ ने मामले की फाइल बंद कर दी और बिना कोई नोटिस जारी किए या आदेश पारित किए सीधे अगली याचिका की सुनवाई शुरू कर दी। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से साफ हो गया कि अदालत हवाई यात्रा को किसी संवैधानिक अधिकार या बुनियादी नागरिक अधिकार के रूप में नहीं देखती जिसे अदालती आदेशों के जरिए रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जाए। यदि किसी यात्री को किराया महंगा लगता है, तो वह वैकल्पिक परिवहन माध्यमों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है।
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बीच विमानन मंत्रालय और केंद्र सरकार के स्तर पर भी हवाई किरायों को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ हो चुकी है। केंद्र सरकार ने हाल ही में ‘भारतीय वायुयान नियम, 2026’ (Indian Aircraft Rules, 2026) को आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया है। मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक गजट के अनुसार ये नए नियम आगामी 1 जनवरी 2027 से देशभर में औपचारिक रूप से लागू हो जाएंगे। इन नए नियमों के आने के बाद यात्रियों को उम्मीद थी कि सरकार किरायों पर लगाम लगाने के लिए कोई सख्त कानूनी व्यवस्था बनाएगी, लेकिन नए दिशानिर्देशों ने भी एयरलाइंस के हाथ में ही नियंत्रण बनाए रखा है।
अधिसूचित नियमों के प्रावधानों के अनुसार सरकार अपनी वर्तमान में जारी गैर-विनियमित और खुली बाजार नीति को आगे भी बरकरार रखेगी। नए नियमों में स्पष्ट किया गया है कि हवाई किराए का पूरा ढांचा केवल और केवल बाजार की मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) की ताकतों पर निर्भर करेगा। जिस रूट पर यात्रियों की संख्या अधिक होगी और सीटों की उपलब्धता कम होगी, वहां कीमतें स्वचालित रूप से बढ़ेंगी और जहां मांग कम होगी वहां टिकट सस्ते मिलेंगे। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयरलाइंस कंपनियों के दैनिक किरायों पर किसी भी प्रकार की सामान्य ऊपरी सीमा यानी प्राइस कैप लगाने या प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण लागू करने की योजना को पूरी तरह नकार दिया है।
हालांकि नए नियमों में सरकार ने एक विशेष सुरक्षात्मक उपबंध जरूर शामिल किया है ताकि देश में उत्पन्न होने वाली किसी बड़ी आपदा के समय यात्रियों का शोषण न हो सके। ‘भारतीय वायुयान नियम 2026’ के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि सरकार सामान्य दिनों में एयरलाइंस की प्राइसिंग स्ट्रेटेजी में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी, लेकिन यदि देश में कोई युद्ध, प्राकृतिक आपदा, महामारी या राष्ट्रीय स्तर का बड़ा संकट पैदा होता है और जनहित में ऐसा करना अपरिहार्य हो जाता है, केवल तभी सरकार हस्तक्षेप करेगी। ऐसी असाधारण स्थितियों में केंद्र सरकार को अस्थायी रूप से टिकटों की अधिकतम सीमा तय करने का विशेष अधिकार होगा।
विमानन विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना महामारी के दौरान जिस तरह सरकार ने सीमित समय के लिए फेयर बैंड्स लागू किए थे, भविष्य में केवल वैसी ही विषम परिस्थितियों में सरकारी नियंत्रण देखने को मिल सकता है। सामान्य दिनों में एयरलाइंस पूरी तरह से एल्गोरिदम और एआई आधारित डायनेमिक प्राइसिंग मॉडल पर ही काम करती रहेंगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि दीवाली, छठ पूजा, क्रिसमस, न्यू ईयर और गर्मियों की छुट्टियों के दौरान यात्रियों को अपनी जेब ढीली करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा, क्योंकि न तो अदालत और न ही सरकारी नियम एयरलाइंस को पीक सीजन में अधिक किराया वसूलने से रोकने जा रहे हैं।
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