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हरतालिका तीज व्रत के 7 कड़े नियम: सुहागिनें गलती से भी न करें ये बड़ी भूल, वरना व्रत का नहीं मिलेगा पूरा फल

सनातन संस्कृति और सुहागिन महिलाओं के धार्मिक जीवन में हरतालिका तीज का व्रत सबसे कठिन, पवित्र और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखे जाने वाले इस निर्जला व्रत में माता पार्वती और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाती है, जिससे अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस साल हरतालिका तीज के पावन अवसर पर देश भर की सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु और उत्तम स्वास्थ्य के लिए दिन-रात बिना जल ग्रहण किए इस कठिन व्रत का पालन करेंगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के नियम बेहद कड़े और अनुशासन से भरे होते हैं, जिनका पालन करना हर व्रतधारी महिला के लिए अनिवार्य माना जाता है। यदि व्रत के दौरान अनजाने में भी कोई धार्मिक त्रुटि या निषेध कार्य हो जाए, तो व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। इसलिए, सुहागिन महिलाओं को पूजा शुरू करने से पहले हरतालिका तीज के सभी जरूरी नियमों, सावधानियों और क्या करें-क्या न करें की पूरी जानकारी अवश्य होनी चाहिए ताकि वे माता पार्वती को प्रसन्न कर सकें।

हरतालिका तीज के व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से निर्जला यानी बिना पानी के रखा जाता है, जिसकी शुरुआत सूर्योदय से पहले सरगी या खानपान के बाद होती है और अगले दिन सूर्योदय के बाद पूजा संपन्न करने के बाद ही जल ग्रहण किया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और बुजुर्गों का मानना है कि जो महिलाएं गर्भवती हैं या किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही हैं, उन्हें अपनी शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए ही इस व्रत का पालन करना चाहिए, क्योंकि धर्म कभी भी शरीर को अत्यधिक कष्ट देने की अनुमति नहीं देता है। व्रत के दौरान मन को शांत रखना और क्रोध या नकारात्मक विचारों से दूर रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं बल्कि तन और मन दोनों की पवित्रता का प्रतीक होता है। पूजा के दौरान पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करना चाहिए और अपने सुहाग की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

हरतालिका तीज के व्रत में कुछ ऐसे काम बताए गए हैं जिन्हें करना शास्त्रों में पूरी तरह से वर्जित माना गया है, और यदि कोई महिला इनका पालन नहीं करती है तो व्रत खंडित हो सकता है। सबसे पहला नियम यह है कि इस दिन भूलकर भी अन्न या जल का सेवन न करें, क्योंकि यह व्रत निर्जला ही फलदायी होता है। दूसरा नियम यह है कि व्रत के दिन दिनभर सोना नहीं चाहिए, बल्कि रात के समय जागकर भजन-कीर्तन और जागरण करना चाहिए, जिसे इस व्रत का सबसे मुख्य हिस्सा माना गया है। तीसरा महत्वपूर्ण नियम यह है कि महिलाओं को इस दिन किसी से भी वाद-विवाद, झूठ बोलने या क्रोध करने से पूरी तरह बचना चाहिए। चौथा नियम यह है कि काले या सफेद रंग के वस्त्रों को पूजा या व्रत के दौरान पहनने से बचना चाहिए, क्योंकि लाल, पीले या हरे रंग के सुहागिनों वाले चमकीले वस्त्र इस दिन अत्यंत शुभ माने जाते हैं। पांचवां नियम यह है कि व्रत के दौरान घर या मंदिर में पूजा की सामग्री खंडित या झूठी नहीं होनी चाहिए। छठवां नियम यह है कि पति के साथ किसी भी प्रकार का मनमुटाव या कटु वचन बोलने से बचें। सातवां और अंतिम नियम यह है कि व्रत खोलने से पहले भगवान को लगाए गए भोग और प्रसाद का वितरण नियमपूर्वक ही करें।

हरतालिका तीज के दिन सुहागिन महिलाओं का सोलह श्रृंगार करना अनिवार्य माना जाता है, जिसमें हाथों में मेहंदी लगाना, महावर लगाना, नए वस्त्र पहनना और सुहाग की सभी वस्तुएं अर्पित करना शामिल है। पूजा के लिए शाम के समय प्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की बालू या मिट्टी से बनी प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है। पूजा की थाली में बेलपत्र, शमी के पत्ते, धूप, दीप, नैवेद्य और सुहाग पिटारा जिसमें चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर और साड़ी होती है, माता को अर्पित किया जाता है। इस दौरान रात्रि जागरण करते हुए महिलाएं स्त्रियां मिलकर पारंपरिक लोक गीत गाती हैं और शिव-पार्वती की कथा सुनती हैं, जिससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। पूजा के दौरान सच्चे मन से की गई प्रार्थना और नियमों का कड़ाई से पालन करने पर घर में कभी भी धन-धान्य और प्रेम की कमी नहीं आती है।

अगले दिन सुबह सूर्योदय के पश्चात स्नान करने के बाद महिलाएं सबसे पहले मां पार्वती को चढ़ाए गए सिंदूर से अपनी मांग भरती हैं और सुहाग की लंबी आयु की कामना करती हैं। इसके बाद ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर और सात्विक भोजन का भोग लगाकर इस कठिन निर्जला व्रत का पारण किया जाता है। पारण के समय सबसे पहले खीर या हलवे का सेवन करना शुभ माना जाता है, जिसके बाद धीरे-धीरे जल और अन्य आहार ग्रहण किया जाता है। इन सभी नियमों और परंपराओं का पालन करते हुए यदि हरतालिका तीज का यह पावन व्रत किया जाए, तो माता पार्वती और महादेव की असीम कृपा से सुहागिनों का वैवाहिक जीवन हमेशा अमर और खुशहाल बना रहता है।