सिर्फ डिग्री काफी नहीं: वकील बनने की राह में ‘लॉयर’ और ‘एडवोकेट’ का अंतर समझना क्यों जरूरी

कानूनी शिक्षा और वकालत के पेशे को लेकर अक्सर लोगों में भ्रम की स्थिति बनी रहती है। कई लोग ‘लॉयर’ (Lawyer) और ‘एडवोकेट’ (Advocate) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन कानून की नजर में इन दोनों शब्दों के मायने और काम करने के अधिकार पूरी तरह अलग हैं। यदि आप भी यह सोचते हैं कि लॉ की डिग्री मिलते ही कोई भी व्यक्ति कोर्ट में जाकर केस लड़ सकता है, तो आप गलतफहमी में हैं। भारत में एक प्रोफेशनल वकील बनने के लिए केवल कानून की पढ़ाई पूरी करना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके बाद की कुछ कानूनी प्रक्रियाएं भी अनिवार्य हैं।

लॉयर और एडवोकेट के बीच का बारीक फर्क

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ‘लॉयर’ वह व्यक्ति होता है जिसने लॉ (LLB) की डिग्री हासिल कर ली है। लॉयर कानूनी सलाह दे सकता है, कानूनी दस्तावेजों का मसौदा तैयार कर सकता है और कानूनी मामलों पर अपनी राय रख सकता है। वहीं, ‘एडवोकेट’ वह व्यक्ति होता है जो लॉ की डिग्री लेने के बाद स्टेट बार काउंसिल (State Bar Council) में खुद को रजिस्टर करवा चुका होता है। बार काउंसिल में पंजीकरण के बिना कोई भी व्यक्ति अदालत में किसी दूसरे पक्ष की ओर से पेश नहीं हो सकता और न ही बहस कर सकता है। यानी, हर एडवोकेट एक लॉयर होता है, लेकिन हर लॉयर एडवोकेट नहीं होता।

बार काउंसिल का रजिस्ट्रेशन क्यों है अनिवार्य?

किसी भी लॉ ग्रेजुएट के लिए ‘एडवोकेट’ बनने की प्रक्रिया में सबसे बड़ा पड़ाव ‘ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन’ (AIBE) पास करना है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा आयोजित यह परीक्षा पास करने के बाद ही किसी व्यक्ति को कोर्ट में प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलता है। यदि कोई व्यक्ति बिना रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस के कोर्ट में केस लड़ने की कोशिश करता है, तो यह कानून का उल्लंघन माना जाता है। इसलिए, अगर आप भी वकालत के क्षेत्र में करियर बनाने की सोच रहे हैं, तो डिग्री के बाद बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन और अनिवार्य परीक्षा की तैयारी को प्राथमिकता दें। सही कानूनी मार्गदर्शन और जानकारी ही आपको एक सफल एडवोकेट बना सकती है।