
सनातन धर्म में सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है, जिसे ‘श्रावण पुत्रदा एकादशी’ और ‘पवित्रा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। यह पावन व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि सच्चे मन और विधि-विधान से इस व्रत का पालन करने पर संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है और संतान के जीवन में आ रहे कष्ट दूर होते हैं। इस बार सावन पुत्रदा एकादशी पर कई अत्यंत दुर्लभ और शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है। हालांकि, एकादशी व्रत के नियम अत्यंत कठोर होते हैं, और अनजाने में की गई छोटी सी भूल भी पूजा के पूर्ण फल से वंचित कर सकती है।
सावन पुत्रदा एकादशी का धार्मिक महत्व और पुण्य फल
पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, सावन मास में भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की संयुक्त आराधना का फल प्राप्त होता है। जब सावन के पवित्र महीने में एकादशी पड़ती है, तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव दोगुना हो जाता है। जो दंपति संतान सुख से वंचित हैं या जिनकी संतान के करियर व स्वास्थ्य में बाधाएं आ रही हैं, उनके लिए यह व्रत कल्पवृक्ष के समान फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान श्रीहरि के ‘नारायण’ स्वरूप के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख, शांति और अखंड सौभाग्य का वास होता है।
व्रत के दौरान इन 5 प्रमुख गलतियों से बचें
एकादशी व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में कुछ विशेष निषेध बताए गए हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य माना जाता है:
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चावल और अन्न का सेवन न करें: एकादशी के दिन चावल खाना शास्त्रों में महापाप के समान माना गया है। इसके साथ ही दाल, अनाज, मसूर की दाल और प्याज-लहसुन जैसे तामसिक भोजन से पूर्ण परहेज रखें।
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तुलसी दल तोड़ने की भूल न करें: भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अनिवार्य होता है, लेकिन एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना सख्त वर्जित है। पूजा के लिए आवश्यक तुलसी दल दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लें।
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क्रोध, झूठ और वाद-विवाद से दूरी: एकादशी केवल आहार का उपवास नहीं, बल्कि मन का संयम भी है। इस दिन किसी की निंदा न करें, अपशब्द न बोलें और घर में क्लेश या अशांति का माहौल बिल्कुल न बनने दें।
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बाल, नाखून काटना और दाढ़ी बनाना वर्जित: इस पावन तिथि पर बाल कटवाना, शेविंग करना या नाखून काटना अशुभ माना जाता है। इसके अलावा शरीर पर तेल या साबुन के अत्यधिक प्रयोग से भी बचना चाहिए।
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दिन में सोने से बचें: एकादशी के दिन आलस्य और दिन में सोने से बचना चाहिए। रात में भी भगवान विष्णु का ध्यान, भजन-कीर्तन या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हुए जागरण करना श्रेष्ठ फलदायी माना गया है।
भगवान विष्णु की पूजा विधि और पारण का नियम
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में गंगाजल छिड़ककर वेदी बनाएं और भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। पंचामृत, पीले पुष्प, पीले चंदन, ऋतु फल और तुलसी दल अर्पित कर धूप-दीप जलाएं। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें और पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा अवश्य सुनें। अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद ब्राह्मणों को सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा देकर ही सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें।
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