
सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष और अत्यंत पूजनीय स्थान माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि (Jyeshtha Purnima) अपने आप में कई मायनों में बेहद खास और चमत्कारी मानी जाती है। आज देश भर में ज्येष्ठ पूर्णिमा का पावन पर्व बेहद हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है। इस बार की पूर्णिमा इसलिए भी अधिक फलदायी हो गई है क्योंकि आज के दिन कई अत्यंत शुभ और दुर्लभ योगों का महासंयोग बन रहा है। ज्योतिषविदों के अनुसार, आज के शुभ योगों में की गई पूजा-अर्चना, पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य करने से साधक को जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व: क्यों बेहद खास है आज का दिन?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ही माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था और इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु के अवतार सत्यनारायण भगवान की पूजा का विधान शुरू हुआ था। इस दिन पवित्र गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से अनजाने में हुए सभी पाप धूल जाते हैं। विवाहित महिलाओं के लिए भी यह दिन सौभाग्य लेकर आता है क्योंकि इसी कालखंड में वट सावित्री व्रत का समापन भी होता है। आधुनिक जेनेरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI सर्च) के अनुसार, लोग इस दिन मानसिक शांति और चंद्र दोष से मुक्ति पाने के लिए विशेष रूप से चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं, जिससे कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है।
सत्यनारायण भगवान की पूजा का सबसे शुभ समय और महामुहूर्त
आज ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर घर-घर में सुख-शांति के लिए भगवान सत्यनारायण की कथा कराने की प्राचीन परंपरा है। ज्योतिष गणना के अनुसार, आज पूजा के लिए कई श्रेष्ठ चौघड़िया और शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। सुबह के समय अमृत और शुभ के चौघड़िया में पूजन करना सर्वोत्तम रहेगा। वहीं, जो श्रद्धालु संध्या काल में प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा पर पूजा करना चाहते हैं, उनके लिए शाम का समय भी बेहद फलदायी है। राहुकाल के समय को छोड़कर पूरे दिन में किसी भी शुभ वेला में श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी का सामूहिक पूजन संपन्न किया जा सकता है, जिससे घर की दरिद्रता का हमेशा के लिए नाश होता है।
संपूर्ण पूजा विधि, नियम और इस चमत्कारी मंत्र का करें जाप
ज्येष्ठ पूर्णिमा की पूजा को सफल बनाने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। अपने घर के मंदिर या स्थानीय पूजा स्थल (Local Temple) की अच्छे से साफ-सफाई करें। एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, पीले फल, पंचामृत और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करें क्योंकि बिना तुलसी के श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और “ॐ श्री लक्ष्म्यै नमः” मंत्रों का कम से कम 108 बार श्रद्धापूर्वक जाप करें। इसके बाद सत्यनारायण भगवान की कथा सुनें या पढ़ें और अंत में कपूर से आरती कर सभी में चरणामृत और पंजीरी का प्रसाद वितरित करें।
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