क्षेत्रीय सिनेमा के मानचित्र पर भोजपुरी फिल्म उद्योग ने पिछले दो दशकों में जो अभूतपूर्व मुकाम हासिल किया है, उसमें अभिनेत्रियों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। पूर्वांचल, बिहार और झारखंड की माटी से जुड़े इस सिनेमा में देश के विभिन्न राज्यों और पृष्ठभूमियों से आए कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। अक्सर दर्शकों को लगता है कि भोजपुरी पर्दे पर साड़ी और सिंदूर में नजर आने वाली सभी अभिनेत्रियां पारंपरिक हिंदू परिवारों से आती हैं, लेकिन असलियत इससे कहीं अधिक विविध और दिलचस्प है। मुंबई और अन्य महानगरों के मुस्लिम परिवारों से ताल्लुक रखने वाली कई खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों ने भोजपुरी सिनेमा में कदम रखकर न केवल इस इंडस्ट्री की रूपरेखा बदली, बल्कि दशकों तक बॉक्स ऑफिस की ‘सुपरस्टार’ बनकर राज किया।
रानी चटर्जी (सबीहा शेख): मंदिर की शूटिंग से मिला नया नाम और बनीं भोजपुरी की ‘क्वीन’
भोजपुरी सिनेमा के पुनरुद्धार और आधुनिक दौर की शुरुआत की जब भी चर्चा होगी, सबसे पहला नाम रानी चटर्जी का आएगा। आज दुनिया जिन्हें रानी चटर्जी के नाम से जानती है, उनका असली नाम ‘सबीहा शेख’ (Sabiha Shaikh) है। मुंबई के एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में जन्मीं सबीहा को बचपन से ही अभिनय और डांस का शौक था। साल 2003 में जब निर्देशक अजय सिन्हा अपनी ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘ससुरा बड़ा पईसावाला’ के लिए मनोज तिवारी के अपोजिट एक नई लड़की की तलाश कर रहे थे, तब उन्होंने महज 14-15 साल की सबीहा को चुना।

सबीहा शेख से ‘रानी चटर्जी’ बनने की कहानी अपने आप में बेहद फिल्मी और रोचक है। फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर में चल रही थी। उस समय मीडिया और स्थानीय लोगों की भारी भीड़ शूटिंग देखने पहुंची। जब कुछ पत्रकारों ने डायरेक्टर से अभिनेत्री का नाम पूछा, तो माहौल में किसी भी तरह के धार्मिक विवाद या हंगामे से बचने के लिए निर्देशक ने तुरंत उनके मुंह से ‘रानी’ नाम निकाल दिया। जब सरनेम पूछा गया तो उन्होंने वहीं मौजूद अपनी यूनिट के एक साथी का सरनेम जोड़कर ‘रानी चटर्जी’ कह दिया। यह फिल्म इतिहास की सबसे बड़ी ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई और सबीहा का यह स्क्रीन नेम हमेशा के लिए उनकी पहचान बन गया। रानी ने 400 से अधिक भोजपुरी फिल्मों में काम किया और ‘देवरा बड़ा सतावेला’, ‘रानी नंबर 786’, ‘गंगा रानी’ जैसी फिल्मों से इंडस्ट्री की सबसे ज्यादा फीस लेने वाली पहली महिला सुपरस्टार बनीं।
सहर अफशा: खेसारी और पवन सिंह के साथ सुपरहिट फिल्में, फिर शोहरत छोड़ चुना अल्लाह का रास्ता
बेंगलुरु के एक संभ्रांत मुस्लिम परिवार से आने वाली सहर अफशा (Sahar Afsha) ने जब भोजपुरी सिनेमा में कदम रखा, तो उन्होंने अपनी सादगी, खूबसूरत मुस्कान और शानदार अभिनय से दर्शकों को अपना दीवाना बना दिया। उन्होंने साल 2020 में सुपरस्टार खेसारी लाल यादव के साथ फिल्म ‘मेंहदी लगा के रखना 3’ से एक ड्रीम डेब्यू किया। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और सहर रातों-रात भोजपुरी की टॉप लीडिंग लेडीज की कतार में शामिल हो गईं।
इसके बाद उन्होंने पवन सिंह के साथ ‘घातक’ और रितेश पांडे के साथ कई बड़े प्रोजेक्ट्स में काम किया। उनका करियर जब सफलता के चरम पर था और उनके पास दर्जनों बड़े निर्माताओं के ऑफर्स थे, तब 2022 में सहर अफशा ने एक ऐसा चौंकाने वाला फैसला लिया जिसने पूरी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को स्तब्ध कर दिया। बॉलीवुड की जायरा वसीम और सना खान की तरह सहर अफशा ने भी सोशल मीडिया पर एक लंबा भावुक पोस्ट साझा करते हुए ऐलान किया कि वह अब ग्लैमर और फिल्मों की दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह रही हैं। सहर ने स्पष्ट किया कि वह अपनी बाकी की जिंदगी अल्लाह के बताए रास्ते, हिजाब और मजहबी तालीम पर चलना चाहती हैं। आज वे ग्लैमर से पूरी तरह दूर होकर अपने वैवाहिक और आध्यात्मिक जीवन में व्यस्त हैं।

शबा खान: सोशल मीडिया सेंसेशन और म्यूजिक वीडियोज की बेताज रानी
भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रोजाना करोड़ों व्यूज हासिल करती है और इस डिजिटल क्रांति का एक प्रमुख चेहरा हैं ‘शबा खान’ (Shaba Khan)। मुंबई की रहने वाली शबा खान ने भोजपुरी म्यूजिक वीडियोज और डांस एलबम्स के जरिए अपनी एक अलग और बेहद मजबूत पहचान बनाई है।
शबा खान ने समर सिंह, खेसारी लाल यादव, अंकुश राजा और अरविंद अकेला ‘कल्लू’ जैसे बड़े गायकों के साथ दर्जनों ट्रेंडिंग गानों में बतौर लीड मॉडल काम किया है। उनके गानों के स्टेप्स और कातिलाना एक्सप्रेशंस यूट्यूब और इंस्टाग्राम रील्स पर खूब वायरल होते हैं। शबा ने यह साबित किया कि बिना फिल्मों में बड़ा रोल किए भी केवल अपनी डांसिंग स्किल्स, लगन और एक्सप्रेशंस के दम पर भोजपुरी दर्शकों के दिलों पर राज किया जा सकता है।
रूबी सिंह और नाजिया खान: पारिवारिक ड्रामा और एक्शन फिल्मों की मजबूत अदाकारा
भोजपुरी सिनेमा की पुरानी और अनुभवी अभिनेत्रियों में रूबी सिंह (Ruby Singh) का नाम भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। रूबी ने ‘भोजपुरिया सुल्तान’, ‘दिलबर सनम’ और ‘जांबाज खिलाड़ी’ जैसी कई हिट फिल्मों में अपनी अदाकारी का जलवा दिखाया। उन्होंने न केवल ग्लैमरस किरदार निभाए बल्कि ठेठ ग्रामीण और पारिवारिक बहु-बेटियों के किरदारों को भी उतनी ही शिद्दत से जिया।
इसी तरह अभिनेत्री नाजिया खान (Nazia Khan) ने भी भोजपुरी और रीजनल सिनेमा में कई प्रोजेक्ट्स में सहायक व चरित्र भूमिकाओं में अपनी प्रतिभा साबित की। इन अभिनेत्रियों ने भाषा और संस्कृति की किसी भी बाधा को अपने आड़े नहीं आने दिया और ठेठ भोजपुरी बोली, लहजे और परंपराओं को इतनी सहजता से अपनाया कि पर्दे पर देखकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता था कि वे गैर-भोजपुरी या मुस्लिम पृष्ठभूमि से आती हैं।
स्क्रीन नेम का चलन: मजबूरी या मार्केटिंग की जरूरत?
मनोरंजन जगत में स्क्रीन नेम (Screen Name) या उपनाम बदलने की परंपरा दशकों पुरानी है। बॉलीवुड में यूसुफ खान का ‘दिलीप कुमार’, बेगम पारा, मधुबाला (मुमताज बेगम) और मीना कुमारी (महजबीं बानो) बनना इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। भोजपुरी सिनेमा में भी जब 90 और 2000 के दशक में मुंबई से अभिनेत्रियां बिहार और यूपी की फिल्मों में काम करने आईं, तो कई बार निर्देशकों और पीआर टीमों ने उन्हें ऐसे स्क्रीन नाम दिए जो स्थानीय दर्शकों के साथ सीधे जुड़ सकें।
यह कदम किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि मुख्य रूप से बॉक्स ऑफिस मार्केटिंग और टारगेट ऑडियंस के साथ भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करने के लिए उठाया जाता था। दर्शकों ने भी कभी कलाकारों को उनके धर्म या मूल नाम के चश्मे से नहीं देखा, बल्कि उनके अभिनय, उनके ठुमकों और उनकी संवाद अदायगी पर दिल खोलकर प्यार और तालियां बरसाईं।
कला की कोई सरहद और मजहब नहीं: भोजपुरी सिनेमा की समावेशी ताकत
रानी चटर्जी से लेकर सहर अफशा और शबा खान तक, इन सभी मुस्लिम अभिनेत्रियों की सफलता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कला, संगीत और सिनेमा किसी धर्म, जाति या राज्य की सीमाओं में बंधे नहीं होते। इन अभिनेत्रियों ने यूपी-बिहार की लोक संस्कृति, छठ गीतों, सावन के कजरी गीतों और पारंपरिक त्योहारों के दृश्यों को पर्दे पर इतनी खूबसूरती और गरिमा के साथ पेश किया कि वे हर भोजपुरी भाषी परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गईं। इन कलाकारों का समर्पण और उनकी यात्रा भारतीय सिनेमा के उस खूबसूरत और समावेशी ताने-बाने को दर्शाती है जहां केवल और केवल प्रतिभा का सम्मान होता है।
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