
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सियासत एक बार फिर से गर्मा गई है और संसद परिसर से लेकर सड़कों तक विपक्षी दलों का शक्ति प्रदर्शन तेज हो गया है। केंद्र सरकार के खिलाफ विभिन्न मुद्दों को लेकर आयोजित किए गए विरोध मार्च और धरने-प्रदर्शन का आज दूसरा दिन था। राहुल गांधी के नेतृत्व में निकाले गए इस मार्च में कांग्रेस के साथ-साथ कई अन्य प्रमुख विपक्षी दलों के नेता तो कंधे से कंधा मिलाकर चलते हुए नजर आए, लेकिन इस बार समाजवादी पार्टी (SP) के नेताओं और सांसदों की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में एक नया भूचाल ला दिया है। उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाली समाजवादी पार्टी का इस बड़े प्रदर्शन से दूरी बना लेना राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है, जिससे विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA Alliance) के भीतर आपसी एकजुटता और समन्वय को लेकर एक बार फिर तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं।
विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे विभिन्न राष्ट्रीय और जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर संसद के बाहर आक्रामक रुख अपनाया जा रहा है। विरोध प्रदर्शन के दूसरे दिन कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने विजय चौक से लेकर संसद भवन तक एक मार्च निकाला, जिसमें महंगाई, बेरोजगारी और अन्य केंद्रीय नीतियों को लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की गई। इस प्रदर्शन में विपक्षी खेमे के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए और उन्होंने सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का गंभीर आरोप लगाया। हालांकि इस साझा मोर्चे पर हर दिन नए राजनीतिक समीकरण और दूरियां देखने को मिल रही हैं। जब भी कोई बड़ा विपक्षी प्रदर्शन आयोजित किया जाता है, तो देश भर की नजरें इस बात पर टिकी होती हैं कि कौन सा दल इसमें पूरी ताकत के साथ शामिल हो रहा है और कौन सा दल अपनी रणनीतिक दूरियां बना रहा है।
इस महत्वपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान समाजवादी पार्टी के किसी भी बड़े नेता या सांसद का नजर न आना इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय दलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और रणनीतियां अब राष्ट्रीय गठबंधन से अलग भी काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल होने के नाते सपा अपने राज्य-केंद्रित मुद्दों और चुनावी तैयारियों को अधिक प्राथमिकता दे रही है, और कई बार राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में उनकी यह अनुपस्थिति आपसी मतभेदों या रणनीतिक असहमतियों को हवा दे देती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्षी गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे, वैचारिक तालमेल या स्थानीय समीकरणों को लेकर समय-समय पर जो खींचतान देखने को मिलती है, यह उसी कड़ी का एक हिस्सा हो सकता है। हालांकि सपा के इस कदम से भले ही भाजपा को विपक्ष पर निशाना साधने का मौका मिल गया हो, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर दल अपने राजनीतिक नफा-नुकसान को तौलकर ही ऐसे कदमों पर फैसला ले रहे हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के खिलाफ एक मजबूत और एकजुट विकल्प खड़ा करने के दावे के साथ बने ‘इंडिया’ गठबंधन के लिए यह स्थिति किसी चुनौती से कम नहीं है। जब भी संसद सत्र के दौरान या बाहर विपक्षी दलों को एक सुर में सरकार को घेरना होता है, तब यदि प्रमुख दल जैसे समाजवादी पार्टी इस तरह के मार्च से दूरी बना लेते हैं, तो जनता के बीच गलत संदेश जाने की संभावना बढ़ जाती है। कांग्रेस और अन्य घटक दलों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे आपसी समन्वय को बेहतर बनाएं और हर बड़े मुद्दे पर सभी क्षेत्रीय सहयोगियों को साथ लेकर चलें। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या समाजवादी पार्टी इस गैरमौजूदगी पर कोई स्पष्टीकरण देती है या फिर विपक्षी एकता की इस तस्वीर में पड़ी दरारें आने वाले चुनावों में और अधिक चौड़ी होती चली जाती हैं।
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