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श्रीदेवी की 38 साल पुरानी जमीन पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने बोनी कपूर, जाह्नवी और खुशी को भेजा नोटिस; जानिए क्या है 2.70 एकड़ जमीन का पूरा मामला

बॉलीवुड की दिवंगत सुपरस्टार अभिनेत्री श्रीदेवी द्वारा करीब 38 साल पहले चेन्नई में खरीदी गई एक बेशकीमती जमीन को लेकर कानूनी विवाद एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म निर्माता बोनी कपूर और उनकी दोनों बेटियों—अभिनेत्री जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। शीर्ष अदालत ने चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड (ECR) स्थित शोलिंगनल्लूर की इस 2.70 एकड़ जमीन पर अगली सुनवाई तक यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का सख्त आदेश दिया है, जिसके तहत जमीन के ट्रांसफर, किसी भी तरह के निर्माण और कब्जे में बदलाव पर पूरी रोक लगा दी गई है।

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दोनों पक्षों को सुझाव दिया कि दशकों पुराने इस विवाद को लंबी कानूनी खींचतान के बजाय मध्यस्थता (Mediation) के जरिए आपसी सहमति से सुलझाया जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज को मध्यस्थ नियुक्त करने का संकेत दिया है और मामले की अगली सुनवाई 18 दिसंबर के लिए तय की है।

विवादित जमीन चेन्नई के पॉश इलाके शोलिंगनल्लूर में सर्वे नंबर 1/1B के तहत स्थित लगभग 2.70 एकड़ का एक भूखंड है। इस जमीन को दिवंगत अभिनेत्री श्रीदेवी ने अपनी मां राजेश्वरी और बहन श्रीलता के साथ मिलकर 19 अप्रैल 1988 को खरीदा था।

साल 2018 में श्रीदेवी के आकस्मिक निधन के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों—पति बोनी कपूर, बेटी जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर ने साल 2023 में राजस्व रिकॉर्ड (पट्‌टा) में इस जमीन को अपने नाम पर ट्रांसफर कराने के लिए आवेदन दाखिल किया। इसी कदम के बाद जमीन बेचने वाले मूल परिवार से जुड़े सदस्यों ने आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे अदालत में चुनौती दे दी।

याचिकाकर्ता एम.सी. शिवकामी और उनके भाई एम.सी. नटराजन का दावा है कि वे जमीन के पूर्व सह-मालिक स्वर्गीय एम.सी. चंद्रशेखरन के वैध कानूनी वारिस हैं। उनका आरोप है कि 1988 में जब यह जमीन बेची गई थी, तब उनके अधिकारों की अनदेखी की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने संपत्ति को पांच बराबर हिस्सों में बांटकर अपने 1/5वें हिस्से की मांग की है और 1988 के सेल डीड को अमान्य व शून्य (Null and Void) घोषित करने की गुहार लगाई है।

इस कानूनी विवाद की शुरुआत चेंगलपट्टू स्थित ट्रायल कोर्ट से हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने शुरुआत में कपूर परिवार की उस अर्जी को खारिज कर दिया था जिसमें केस को पहली नजर में ही रद्द करने की मांग की गई थी। ट्रायल कोर्ट का मानना था कि मामले में तथ्यों की जांच ट्रायल के दौरान होनी चाहिए।

इसके खिलाफ बोनी कपूर और उनकी बेटियों ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 20 अप्रैल को मद्रास हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कपूर परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इस सिविल मुकदमे को पूरी तरह खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि:

  • याचिकाकर्ताओं का यह दावा बिल्कुल अविश्वसनीय है कि उन्हें 1988 में हुए सौदे की जानकारी लगभग 40 साल बाद यानी 2023 में हुई।

  • जमीन की बिक्री 1988 में हुई थी और याचिकाकर्ता 1995 और 1999 में ही बालिग (वयस्क) हो चुके थे, लेकिन उन्होंने मुकदमा 2025 में दायर किया।

  • परिसीमा कानून (Law of Limitation) के तहत इतने दशकों बाद किसी पंजीकृत बिक्री विलेख (Sale Deed) को चुनौती नहीं दी जा सकती।

  • याचिकाकर्ताओं ने पूर्व में दायर मुकदमे और पारिवारिक तथ्यों को छिपाकर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की थी।

हाईकोर्ट के इसी आदेश को चुनौती देते हुए शिवकामी और उनके भाई ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की।

सुप्रीम कोर्ट में कपूर परिवार की ओर से पेश हुए देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। सिंघवी ने दलील दी कि यह मुकदमा पूरी तरह से कानून की मियाद (Statute of Limitations) से बाहर है और न्यायिक प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि सेल डीड 19 अप्रैल 1988 की है। श्रीदेवी के निधन के बाद सिर्फ पट्‌टा ट्रांसफर के लिए आवेदन किया गया था। 30 साल से अधिक समय बीतने के बाद याचिकाकर्ता केवल उस पट्‌टा आवेदन को आधार बनाकर 1988 के कानूनी दस्तावेज को रद्द कराना चाहते हैं, जिसकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 7 रूल 11 के तहत अर्जी पर फैसला करते समय ‘मिनी-ट्रायल’ चला दिया और याचिकाकर्ताओं के वारिस होने की वैधता पर जल्दबाजी में निष्कर्ष निकाल लिया, जिसे केवल नियमित ट्रायल के बाद ही तय किया जा सकता था।

पीठ ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद यह माना कि ऐसे लंबे पारिवारिक और संपत्ति विवादों में कई पीढ़ियां मुकदमेबाजी में उलझ जाती हैं। बेंच ने दोनों पक्षों से कहा कि बेहतर होगा कि वे एक पूर्व हाईकोर्ट जज की निगरानी में आमने-सामने बैठकर इसका कोई सम्मानजनक और सौहार्दपूर्ण समाधान निकालें।

अदालत ने साफ किया कि जब तक मध्यस्थता की प्रक्रिया पूरी नहीं होती और 18 दिसंबर को रिपोर्ट पेश नहीं की जाती, तब तक विवादित जमीन पर किसी भी तरह की खरीद-फरोख्त या निर्माण कार्य पर यथास्थिति बनी रहेगी।