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शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा संकट: देश के 10 राज्यों में क्लासरूम छोड़ सड़कों पर उतरे स्कूली बच्चे, बदहाल तंत्र की खुली पोल

देश के विभिन्न राज्यों से सामने आ रही तस्वीरें स्कूली शिक्षा तंत्र की बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड समेत लगभग 10 राज्यों में स्कूली बच्चे अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। आम तौर पर कॉलेज और विश्वविद्यालयों में दिखने वाला छात्र आक्रोश अब प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के बच्चों में भी देखने को मिल रहा है। ‘जेन अल्फा’ (2010 के बाद जन्मी पीढ़ी) के ये छात्र किसी राजनीतिक मांग के लिए नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं जैसे पीने के साफ पानी, चालू पंखे, पक्की छत और विषय विशेषज्ञों की तैनाती की मांग को लेकर धरने पर बैठने को मजबूर हैं।

शिक्षकों का भारी टोटा और जर्जर भवनों का खौफ

जमीनी हकीकत यह है कि हजारों सरकारी स्कूलों में स्वीकृत पदों के मुकाबले शिक्षकों की भारी कमी है। बोर्ड परीक्षाओं के करीब होने के बावजूद विज्ञान और गणित जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षक मौजूद नहीं हैं। इसके अलावा स्कूलों के भवनों की हालत इतनी जर्जर है कि बारिश के मौसम में छतों से पानी टपकता है और बच्चों को जान जोखिम में डालकर बैठना पड़ता है। कई ग्रामीण इलाकों में तो स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़कें तक नहीं हैं, जिसके कारण बारिश में बच्चों का स्कूल जाना पूरी तरह बंद हो जाता है।

शौचालय, बिजली और खराब मिड-डे मील ने बढ़ाई नाराजगी

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE+) और विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, देश के लाखों स्कूलों में आज भी बुनियादी ढांचे का गंभीर अभाव है। कई स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और चालू हालत में शौचालय नहीं हैं। आवासीय और सर्वोदय विद्यालयों के हॉस्टलों में घटिया स्तर का खाना और अस्वच्छ पेयजल बच्चों की सेहत से खिलवाड़ कर रहा है। बार-बार शिकायतों और अधिकारियों से गुहार लगाने के बाद भी जब कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तब बच्चों को हाईवे जाम करने और कलेक्ट्रेट का घेराव करने जैसे कदम उठाने पड़े।

शिक्षा के बजट और दावों के बीच बढ़ता फासला

डिजिटल शिक्षा और स्मार्ट क्लासरूम के बड़े-बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी ढांचा ही चरमराया हुआ है। जब तक स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित इमारतें, स्वच्छ पेयजल और गरिमापूर्ण माहौल नहीं दिया जाएगा, तब तक शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा। बच्चों का सड़क पर उतरना स्पष्ट संकेत है कि अब शिक्षा नीति को केवल नारों से आगे बढ़कर वास्तविक सुधारों पर काम करना होगा।