
यदि आप भारत के सामान्य निवासी (Resident and Ordinarily Resident – ROR) हैं और आपने विदेश में कोई फ्लैट, विला, प्लॉट, कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदी है अथवा किसी विदेशी बैंक में खाता या शेयर बाजार में निवेश कर रखा है, तो यह खबर सीधे आपके लिए है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) और आयकर विभाग ने विदेशी संपत्तियों और विदेशों से होने वाली आय को लेकर निगरानी प्रणाली को बेहद कड़ा कर दिया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिन करदाताओं ने चालू आकलन वर्ष के अपने आयकर रिटर्न (ITR) में विदेशी परिसंपत्तियों का ब्योरा नहीं दिया है या जिनके पास कोई अघोषित विदेशी संपत्ति है, वे 31 दिसंबर तक अपना रिवाइज्ड या बेलेटेड रिटर्न दाखिल करके अथवा निर्धारित योजना के तहत इसका अनिवार्य रूप से खुलासा कर दें। समयसीमा समाप्त होने के बाद पकड़े जाने पर न केवल भारी जुर्माना लगेगा, बल्कि कठोर कानूनी कार्रवाई का सामना भी करना पड़ सकता है।
आयकर कानून के नियमों के तहत यदि किसी करदाता ने 31 जुलाई की सामान्य समयसीमा तक अपना आईटीआर दाखिल नहीं किया था या फिर रिटर्न भरते समय अनजाने में विदेश में स्थित अचल संपत्ति (Immovable Property), बैंक खाते, शेयर, ईसॉप्स (ESOPs) या विदेशी ट्रस्ट में अपनी हिस्सेदारी की जानकारी दर्ज करने से चूक गया था, तो उसके पास धारा 139(4) के तहत बेलेटेड रिटर्न या धारा 139(5) के तहत रिवाइज्ड (संशोधित) रिटर्न फाइल करने के लिए 31 दिसंबर तक का ही अंतिम मौका होता है। 31 दिसंबर की मध्यरात्रि के बाद पोर्टल पर उस आकलन वर्ष के लिए नियमित संशोधित रिटर्न दाखिल करने का विकल्प बंद हो जाता है। यह अनिवार्यता उन सभी भारतीय निवासियों पर लागू होती है जिनके पास दुनिया के किसी भी कोने में कोई वित्तीय या भौतिक संपत्ति है, भले ही उस संपत्ति से चालू वर्ष में कोई आय हुई हो या न हुई हो।
अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि उन्होंने विदेश में प्रॉपर्टी अपनी वैध, टैक्स-पेड कमाई या पूर्व एनआरआई दर्जे के दौरान खरीदी थी, इसलिए अब उस पर भारत में कोई टैक्स देनदारी नहीं बनती और उसे घोषित करने की जरूरत नहीं है। आयकर विशेषज्ञों के अनुसार यही सबसे बड़ी और घातक गलतफहमी है। भारतीय आयकर रिटर्न के फॉर्म ITR-2 और ITR-3 में एक विशेष अनुभाग होता है, जिसे ‘शेड्यूल एफए’ (Schedule Foreign Assets) कहा जाता है। यदि कोई व्यक्ति भारत में ‘रेजिडेंट’ की श्रेणी में आता है, तो उसके लिए शेड्यूल एफए की टेबल बी (Table B – Immovable Property) में विदेश में मौजूद हर जमीन, मकान या अपार्टमेंट की खरीद की तारीख, देश का नाम, कुल निवेश लागत और उससे होने वाली किराये आदि की आय का सटीक विवरण दर्ज करना कानूनन अनिवार्य है। ऐसा न करना कानून का सीधा उल्लंघन माना जाता है।
विदेश में स्थित अचल संपत्ति या निवेश की जानकारी छिपाने पर सामान्य इनकम टैक्स एक्ट की बजाय बेहद सख्त ‘काला धन (अघोषित विदेशी आय और परिसंपत्ति) एवं कर अधिरोपण अधिनियम, 2015’ (Black Money Act) लागू होता है।
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धारा 42 और 43 के तहत जुर्माना: यदि कोई करदाता शेड्यूल एफए में अपनी विदेशी संपत्ति का खुलासा करने में विफल रहता है या गलत जानकारी देता है, तो उस पर सीधे ₹10 लाख का एकमुश्त अनिवार्य जुर्माना लगाया जाता है। यह जुर्माना सिर्फ जानकारी न देने (Reporting Failure) पर लगता है, भले ही संपत्ति पूरी तरह लीगल पैसे से खरीदी गई हो।
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30% टैक्स और 90% अतिरिक्त पेनल्टी: यदि विभाग यह पाता है कि संपत्ति की खरीद में इस्तेमाल किया गया धन अघोषित था, तो संपत्ति के मौजूदा फेयर मार्केट वैल्यू पर 30% का फ्लैट टैक्स वसूला जाएगा और धारा 41 के तहत उस टैक्स का 300% (यानी संपत्ति मूल्य का 90%) तक अतिरिक्त जुर्माना ठोंक दिया जाएगा। कुल मिलाकर संपत्ति के मूल्य का 120% तक केवल टैक्स और पेनल्टी में चला जाता है, साथ ही कारावास (सजा) का कानूनी प्रावधान भी सक्रिय हो जाता है।
यदि आप सोचते हैं कि दुबई, लंदन, सिंगापुर, कनाडा या अमेरिका में खरीदी गई प्रॉपर्टी की भनक भारतीय आयकर विभाग को नहीं लगेगी, तो यह तकनीकी रूप से असंभव है। भारत सरकार दुनिया के 100 से अधिक देशों के साथ ‘कॉमन रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड’ (CRS) और अमेरिका के साथ ‘फाटका’ (FATCA) समझौते के तहत जुड़ी हुई है। इस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के तहत विदेशी वित्तीय संस्थान, बैंक और टैक्स एजेंसियां भारतीय निवासियों द्वारा किए गए बड़े पूंजीगत लेन-देन, प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन और बैंक खातों का ब्योरा स्वतः भारतीय कर विभाग के साथ सालाना आधार पर साझा करती हैं। आयकर विभाग का आधुनिक एआई (AI) और बिग डेटा एनालिटिक्स सिस्टम इन विदेशी रिकॉर्ड्स को करदाता के पैन (PAN) और एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) से स्वतः मैच कर लेता है। इसी डिजिटल मिलान के आधार पर अब बड़े पैमाने पर करदाताओं को ई-वेरिफिकेशन और अनुपालन के नोटिस भेजे जा रहे हैं।
जो भारतीय नागरिक हाल ही में विदेश से अपनी नौकरी या व्यवसाय समेटकर स्थायी रूप से भारत लौटे हैं, उन्हें अपनी आवासीय स्थिति (Residential Status) का तुरंत आकलन कराना चाहिए। भारत लौटने के शुरुआती 1 से 3 वर्षों के दौरान वे ‘रेजिडेंट बट नॉट ऑर्डिनरी रेजिडेंट’ (RNOR) का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं, जिस दौरान उन्हें विदेशी संपत्तियों पर अस्थायी राहत मिलती है। लेकिन जैसे ही वे ‘आरईआर’ (ROR) बनते हैं, शेड्यूल एफए का अनुपालन अनिवार्य हो जाता है। यदि आपने अपने हालिया रिटर्न में किसी विदेशी फ्लैट, शेयर, बीमा पॉलिसी या बैंक खाते को रिपोर्ट नहीं किया है, तो किसी योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से सलाह लेकर 31 दिसंबर की समयसीमा से पहले अपना रिटर्न तुरंत रिवाइज कर लें। समय रहते किया गया यह पारदर्शी खुलासा आपको 10 लाख रुपये के जुर्माने और भविष्य की लंबी कानूनी पेचीदगियों से पूरी तरह सुरक्षित रखेगा।
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