विदेशी कोयले पर घटी भारत की निर्भरता: अगस्त में आयात 5.83% गिरकर 104.57 मिलियन टन रहा

भारत ऊर्जा के मोर्चे पर आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है और इसके सकारात्मक नतीजे अब साफ तौर पर आंकड़ों में दिखने लगे हैं। देश में चालू वित्त वर्ष के दौरान अगस्त महीने में विदेशी कोयले के आयात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में कोयला आयात 5.83 प्रतिशत घटकर 104.57 मिलियन टन रह गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में 111.05 मिलियन टन के स्तर पर था। यह गिरावट केवल एक संयोग नहीं है, बल्कि देश के भीतर कोयला खदानों से रिकॉर्ड उत्पादन और केंद्र सरकार की आयात प्रतिस्थापन नीतियों का सीधा परिणाम है। घरेलू खदानों से आपूर्ति बढ़ने के कारण बिजली कंपनियों और औद्योगिक इकाइयों को अब अंतरराष्ट्रीय बाजार के महंगे कोयले पर पहले की तरह निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है। वैश्विक ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमतों में आने वाले उतार-चढ़ाव के बीच यह खबर भारतीय अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार दोनों के लिहाज से एक बड़ी राहत बनकर सामने आई है। घरेलू स्तर पर कोल इंडिया और कैप्टिव खदानों से लगातार हो रही रिकॉर्ड निकासी ने देश के ऊर्जा तंत्र को एक मजबूत सुरक्षा कवच दिया है, जिससे देश के थर्मल पावर प्लांट्स में ईंधन का पर्याप्त भंडार बना हुआ है।

आयात के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि गिरावट का सबसे बड़ा कारण नॉन-कोकिंग कोयले के शिपमेंट में आई कमी है। नॉन-कोकिंग कोयला मुख्य रूप से बिजली उत्पादन और सीमेंट जैसे भारी उद्योगों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। समीक्षाधीन अवधि के दौरान नॉन-कोकिंग कोयले का आयात घटकर लगभग 67.52 मिलियन टन रह गया, जो पिछले साल की इसी अवधि में 72.84 मिलियन टन दर्ज किया गया था। सीधे शब्दों में कहें तो बिजली उत्पादन के लिए विदेश से आने वाले स्टीम कोल की खपत में भारी कटौती हुई है। दूसरी ओर, स्टील निर्माण में इस्तेमाल होने वाले मेटालर्जिकल या कोकिंग कोयले के आयात में बहुत ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिला है। कोकिंग कोयले का आयात 24.86 मिलियन टन के आसपास स्थिर बना हुआ है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोयले का घरेलू भंडार बेहद सीमित है, जिसके चलते देश के बड़े स्टील निर्माताओं को अपनी ब्लास्ट फर्नेस चलाने के लिए मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और रूस जैसे देशों से आयात पर ही निर्भर रहना पड़ता है। हालांकि, सरकार घरेलू कोकिंग कोल की वाशिंग और गैसीफिकेशन तकनीकों को बढ़ावा देकर इस वर्ग में भी आयात कम करने के लिए नई नीतियों पर काम कर रही है।

बिजली क्षेत्र भारत में कोयले का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, और आयात में आई इस गिरावट का सबसे बड़ा श्रेय थर्मल पावर सेक्टर के घरेलू प्रबंधन को जाता है। केंद्रीय ऊर्जा प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, देश के थर्मल पावर स्टेशनों ने पिछले एक साल में घरेलू कोयले के इस्तेमाल को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। सरकार द्वारा घरेलू स्तर पर की गई लॉजिस्टिक्स सुदृढ़ीकरण और रेलवे के साथ बेहतर तालमेल के कारण खदानों से बिजली संयंत्रों तक कोयले की रैक तेजी से पहुंच रही हैं। मानसून के मौसम में आमतौर पर खदानों में पानी भरने के कारण कोयला उत्पादन और आपूर्ति बाधित होती थी, जिसके चलते बिजली कंपनियों को अचानक विदेशी कोयला मंगाना पड़ता था। मगर इस बार सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड ने मानसून से पहले ही पर्याप्त बफर स्टॉक तैयार कर लिया था। थर्मल पावर प्लांट्स के पास 30 से 35 दिनों का सुरक्षित स्टॉक होने की वजह से मानसून के दौरान भी विदेशी कोयले का ब्लेंडिंग अनुपात न्यूनतम स्तर पर रखा गया। इससे बिजली उत्पादन कंपनियों की उत्पादन लागत में उल्लेखनीय बचत हुई है, जिसका सीधा लाभ भविष्य में औद्योगिक व घरेलू बिजली दरों की स्थिरता के रूप में देखा जा सकता है।

स्टील और सीमेंट जैसे गैर-विनियमित क्षेत्रों में कोयले की मांग की गतिशीलता बिजली क्षेत्र की तुलना में काफी अलग नजर आती है। भारतीय इस्पात उद्योग घरेलू बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और रियल एस्टेट क्षेत्र की मजबूत मांग के दम पर तेज विस्तार के दौर से गुजर रहा है। स्टील मिलों की बढ़ती क्षमता के कारण कोकिंग कोयले की जरूरत लगातार बनी हुई है। घरेलू स्तर पर पर्याप्त और उपयुक्त ग्रेड का कोकिंग कोयला उपलब्ध न होने के कारण स्टील कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय दरों पर निर्भर रहना पड़ता है। हालांकि, इन कंपनियों ने आयात के जोखिम को कम करने के लिए अपने सप्लायर बेस का विविधीकरण किया है। अब भारतीय कंपनियां केवल एक या दो देशों पर निर्भर रहने के बजाय प्रतिस्पर्धी कीमतों पर विभिन्न वैश्विक बाजारों से शिपमेंट उठा रही हैं। इसके अलावा, सीमेंट और स्पंज आयरन निर्माताओं ने ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और आयातित ईंधन का खर्च घटाने के लिए वैकल्पिक ईंधनों, बायोमास और पेटकोक का उपयोग बढ़ाना शुरू कर दिया है। सरकार की कमर्शियल कोल माइनिंग पॉलिसी के तहत निजी कंपनियों को खदानें आवंटित होने से गैर-बिजली उद्योगों को भी घरेलू बाजार से सीधे कोयला मिलने लगा है, जिससे उनकी विदेशी बाजारों पर निर्भरता घट रही है।

भारत में विदेशी कोयले के घटते आयात के पीछे सरकार के दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों की अहम भूमिका है। केंद्र सरकार द्वारा वाणिज्यिक कोयला खनन को निजी क्षेत्र के लिए पूरी तरह खोले जाने के बाद से कैप्टिव और कमर्शियल ब्लॉक्स से उत्पादन में जबरदस्त उछाल आया है। निजी कंपनियों ने अत्याधुनिक तकनीकों और आधुनिक मशीनरी का उपयोग करके खदानों से कोयला निकालने की रफ्तार को दोगुना कर दिया है। इसके साथ ही, फर्स्ट-माइल कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर भारी निवेश किया गया है, जिसके तहत खदानों से रेलवे साइडिंग तक कोयले को बेल्ट कन्वेयर और कवर्ड वैगनों के जरिए पहुंचाया जा रहा है। इससे न केवल पर्यावरण को होने वाले नुकसान और कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, बल्कि ढुलाई के समय और लॉजिस्टिक्स खर्च में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। राजस्व बंटवारे के नए मॉडल ने निवेशकों को आकर्षित किया है, जिसके परिणामस्वरूप कई नई खदानें रिकॉर्ड समय में चालू हो चुकी हैं। यह घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने और आयात बिल को कम करने की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव साबित हो रहा है।

भारत सरकार ने आने वाले वर्षों में तापीय बिजली उत्पादन के लिए विदेशी कोयले के आयात को शून्य के करीब लाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। हालांकि, देश की आर्थिक वृद्धि दर तेज होने से बिजली की कुल मांग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, फिर भी घरेलू कोयला उत्पादन की विकास दर इस बढ़ती मांग को पूरा करने में सक्षम साबित हो रही है। देश का लक्ष्य सालाना एक अरब टन से अधिक कोयला उत्पादन को पार कर निरंतर नए रिकॉर्ड बनाना है। इसके साथ ही, कोकिंग कोल मिशन के तहत घरेलू वाशरियों की क्षमता बढ़ाई जा रही है ताकि घरेलू कोयले की राख की मात्रा कम करके उसे स्टील उद्योग के अनुकूल बनाया जा सके। जब तक स्टील क्षेत्र के लिए ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य स्वच्छ तकनीकें पूरी तरह से व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक नहीं हो जातीं, तब तक कोकिंग कोयले का सीमित आयात जारी रहेगा, लेकिन थर्मल कोल के मोर्चे पर भारत ने लगभग आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। अगस्त के आयात आंकड़े इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि भारत ऊर्जा सुरक्षा के मामले में बाहरी झटकों से सुरक्षित हो रहा है और घरेलू संसाधनों के कुशल दोहन से अपनी अर्थव्यवस्था को नई गति दे रहा है।