
मानव अंग दान ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है, और सभी महत्वपूर्ण अंगों में लिवर अपनी अविश्वसनीय पुनरुत्थान क्षमता यानी रीजेनरेशन पावर के कारण सबसे अलग और खास स्थान रखता है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति अपने किसी करीबी या परिवार के सदस्य की जान बचाने के लिए लिवर डोनेट करने का विचार करता है, तो उसके मन में सबसे पहला और सबसे स्वाभाविक सवाल यही आता है कि आखिर लिवर का कितना हिस्सा शरीर से सुरक्षित रूप से बाहर निकाला जा सकता है, और क्या इसके बाद यह दोबारा बढ़ पाता है? मेडिकल साइंस ने पिछले कुछ दशकों में इतनी तरक्की कर ली है कि आज लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट (LDLT) दुनिया भर में सबसे सफल और सुरक्षित सर्जरीज में से एक माना जाता है। दिल या किडनी जैसे अन्य अंगों के विपरीत, प्रकृति ने लिवर को एक ऐसा अद्भुत वरदान दिया है कि यह कटने या निकाले जाने के कुछ ही हफ्तों के भीतर खुद-ब-खुद अपने मूल आकार और वजन में वापस आ जाता है। यही अनोखी विशेषता आज के समय में हजारों ऐसे मरीजों के लिए वरदान साबित हो रही है जो अंतिम चरण की लिवर की बीमारी, सिरोसिस या लिवर कैंसर से जूझ रहे हैं और बिना डोनर के अपनी जिंदगी की जंग हारने की कगार पर पहुंच चुके हैं।
जब कोई स्वस्थ व्यक्ति अपने किसी परिजन को बचाने के लिए लिवर दान करने का संकल्प लेता है, तो डॉक्टरों और सर्जन की टीम के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह तय करने की होती है कि डोनर के शरीर से लिवर का कितना प्रतिशत हिस्सा निकाला जाए। मानव शरीर का लिवर मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में बंटा होता है, जिन्हें दायां लोब (Right Lobe) और बायां लोब (Left Lobe) कहा जाता है। वयस्क से वयस्क (Adult-to-Adult) लिवर ट्रांसप्लांट के मामलों में डोनर के शरीर से आमतौर पर लिवर का दायां हिस्सा निकाला जाता है, जो कुल अंग के वजन और आकार का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा होता है। वहीं दूसरी ओर, यदि ट्रांसप्लांट किसी छोटे बच्चे या कम वजन वाले मरीज के लिए किया जा रहा है, तो डोनर के लिवर का बायां हिस्सा (Left Lobe) या उसका एक छोटा पार्श्व भाग निकाला जाता है, जो कुल लिवर का लगभग 20 से 30 प्रतिशत होता है। मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार सर्जन हमेशा इस बात को प्राथमिकता देते हैं कि डोनर के शरीर में कम से कम 30 से 40 प्रतिशत स्वस्थ लिवर सुरक्षित बचा रहे, ताकि उसके शरीर की तमाम जैविक प्रक्रियाएं, पाचन क्रिया और मेटाबॉलिज्म बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से चलते रहें। यह पूरा निर्णय डोनर और रिसीवर के शरीर के कुल वजन, शारीरिक संरचना, ब्लड ग्रुप और गहन मेडिकल टेस्ट्स की रिपोर्ट का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद ही विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा लिया जाता है।
लिवर दुनिया का इकलौता ऐसा आंतरिक अंग है जो सर्जरी के दौरान काटे जाने या उसका बड़ा हिस्सा निकाल लिए जाने के बावजूद अपने आप दोबारा बढ़ जाता है, और इस चमत्कारिक प्रक्रिया को विज्ञान की भाषा में ‘हेपेटिक रीजेनरेशन’ (Hepatic Regeneration) कहा जाता है। जैसे ही सर्जन डोनर के शरीर से लिवर का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा बाहर निकालते हैं, शरीर के इस जादुई अंग की कोशिकाएं तुरंत इस बात को भांप लेती हैं और रिकवरी का चक्र शुरू हो जाता है। लिवर की बुनियादी इकाइयां जिन्हें हेपैटोसाइट्स (Hepatocytes) कहा जाता है, बहुत तेजी से विभाजित होना शुरू कर देती हैं ताकि अंग की कमी को पूरा किया जा सके। यहां यह समझना बेहद दिलचस्प है कि लिवर अपनी खोई हुई बाहरी शेप या आकृति को दोबारा नहीं बनाता, बल्कि वह अपने कुल आयतन, द्रव्यमान और कार्यक्षमता (Volume and Mass) को पूरी तरह से दोबारा हासिल कर लेता है। इसका आसान शब्दों में मतलब यह है कि अगर किसी डोनर का दायां हिस्सा निकाला गया है, तो बचा हुआ बायां हिस्सा फूलकर और फैलकर अपने आकार को इतना बड़ा कर लेता है जो पूरे शरीर की जरूरतों को आसानी से संभाल सके। ट्रांसप्लांट के तुरंत बाद शुरुआती कुछ हफ्तों में यह रीजेनरेशन प्रक्रिया सबसे तेज गति से काम करती है, और महज 6 से 8 सप्ताह के भीतर लिवर अपने मूल आकार का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा दोबारा प्राप्त कर लेता है, जिससे डोनर कुछ ही महीनों में पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है।
हर कोई अपनी मर्जी से लिवर दान करने के योग्य नहीं माना जाता, क्योंकि चिकित्सा जगत ने डोनर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बेहद कड़े और सटीक दिशा-निर्देश तय किए हैं। सबसे पहली शर्त यह होती है कि डोनर की आयु आमतौर पर 18 वर्ष से 55 वर्ष के बीच होनी चाहिए और उसका शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होना अनिवार्य है। डोनर और मरीज का ब्लड ग्रुप आपस में मिलना चाहिए, हालांकि आधुनिक चिकित्सा तकनीकों में अब ब्लड ग्रुप इनकम्पैटिबल ट्रांसप्लांट भी संभव हो चुके हैं फिर भी मैचिंग को सबसे सुरक्षित माना जाता है। डोनर को किसी भी प्रकार की गंभीर जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जैसे कि अनियंत्रित डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हेपेटाइटिस बी या सी, किडनी से जुड़ी समस्याएं या गंभीर हृदय रोग नहीं होने चाहिए। इसके अलावा, जिन लोगों के लिवर में फैटी लिवर (Fatty Liver) की समस्या या अत्यधिक चर्बी जमा होती है, उन्हें डॉक्टर डोनर के रूप में अस्वीकार कर देते हैं क्योंकि ऐसा लिवर न केवल डोनर के लिए बल्कि मरीज के लिए भी जोखिम भरा साबित हो सकता है। डोनर की फिटनेस सुनिश्चित करने के लिए सीटी स्कैन, एमआरआई, लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT), अल्ट्रासाउंड और मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन करने के लिए कई तरह की चिकित्सीय जांचें की जाती हैं, और जब डॉक्टर पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं तभी सर्जरी की हरी झंडी दी जाती है।
आम लोगों के मन में अक्सर यह बड़ा डर बैठा रहता है कि लिवर का बड़ा हिस्सा दान करने के बाद डोनर की जिंदगी हमेशा के लिए विकलांग जैसी हो जाएगी या वह कभी सामान्य जीवन नहीं जी पाएगा, लेकिन विज्ञान इन सभी धारणाओं को पूरी तरह खारिज करता है। सफल सर्जरी के बाद अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद डोनर को शुरुआती डेढ़ से दो महीने तक भारी वजन उठाने, अत्यधिक शारीरिक श्रम करने या जिम जैसी गतिविधियों से बचने की सख्त सलाह दी जाती है। इस रिकवरी पीरियड के दौरान शरीर आंतरिक रूप से खुद को मजबूत कर रहा होता है, इसलिए डॉक्टर प्रोटीन से भरपूर संतुलित आहार, पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और समय पर दवाइयां लेने की सलाह देते हैं। अधिकांश लिवर डोनर सर्जरी के 2 से 3 महीने के भीतर अपनी नॉर्मल रूटीन लाइफ में लौट आते हैं और दफ्तर जाकर अपने काम को पूरी क्षमता के साथ संभालते हैं। चूंकि लिवर रीजेनरेट होकर अपनी पूरी कार्यक्षमता वापस पा चुका होता है, इसलिए डोनर को जीवनभर किसी भी तरह की भारी-भरकम या विशेष दवाइयों पर निर्भर रहने की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती, जो कि केवल उस मरीज को खानी पड़ती है जिसके शरीर में नया लिवर प्रत्यारोपित किया गया है। इस प्रकार एक स्वस्थ व्यक्ति बिना किसी स्थायी नुकसान के किसी कीमती जिंदगी को बचाकर समाज के लिए एक मिसाल बन सकता है।
भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देशों में आज भी अंग दान (Organ Donation) को लेकर समाज में कई तरह की दबी जुबान में फैली भ्रांतियां, डर और संकोच देखने को मिलते हैं, जिन्हें दूर करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। लिवर ट्रांसप्लांट जैसी जटिल और उच्च तकनीकी सर्जरीज आज देश के प्रतिष्ठित अस्पतालों में दुनिया के बेहतरीन सर्जन्स द्वारा सफलतापूर्वक अंजाम दी जा रही हैं, जिससे हर साल हजारों बेबस मरीजों को नया जीवन मिल रहा है। यदि प्रत्येक नागरिक अंगदान के वैज्ञानिक सत्यों, इसके सुरक्षित प्रावधानों और डोनर की सुरक्षा से जुड़े नियमों के प्रति जागरूक हो जाए, तो समय पर डोनर न मिलने के कारण दम तोड़ने वाले अनगिनत मासूमों की जान बचाई जा सकती है। कुदरत का यह करिश्मा कि लिवर अपने आप दोबारा बढ़ सकता है, मानव जाति के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो यह सिखाता है कि हमारे शरीर में बांटने और जीवन देने की कितनी अद्भुत क्षमता छिपी हुई है। आइए, अंगदान को लेकर फैली सभी प्रकार की नकारात्मकताओं और डर को पीछे छोड़ें, इस महान पहल का हिस्सा बनें और समाज के जरूरतमंद लोगों के जीवन में उम्मीद का नया सवेरा लेकर आएं ताकि हर कोई स्वस्थ और खुशहाल भविष्य का आनंद ले सके।
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