
वर्तमान समय में समाज और देश के सामने महिलाओं की सुरक्षा एक बहुत बड़ा और गंभीर विषय बना हुआ है। आए दिन महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों और उनकी स्वतंत्रता पर लगने वाले प्रतिबंधों को लेकर तरह-तरह की बहसें देखने को मिलती हैं। इसी बीच न्याय व्यवस्था की ओर से एक ऐसा मजबूत और दूरदर्शी संदेश सामने आया है जो समाज की सोच को झकझोरने का काम करता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में महिलाओं की सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि समाज और परिवारों को लड़कियों के पहनावे और उनके चाल-चलन को नियंत्रित करने के बजाय लड़कों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाना चाहिए। यह फैसला न केवल कानूनी दायरे में बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
न्यायालय की ऐतिहासिक टिप्पणी और सामाजिक दृष्टिकोण
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह कड़ा संदेश दिया कि अपराध और हिंसा की जड़ें अक्सर समाज की उन पुरानी और संकुचित सोच में होती हैं जो महिलाओं को ही हर बात के लिए जिम्मेदार ठहराती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला या लड़की के कपड़े पहनने के तरीके से उसके साथ होने वाले दुर्व्यवहार को कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता। न्याय मूर्ति ने इस बात पर जोर दिया कि असली बदलाव की शुरुआत घरों से होनी चाहिए। जब तक हम अपने बेटों को यह नहीं सिखाएंगे कि महिलाओं की सहमति और उनकी गरिमा का सम्मान कैसे करना है, तब तक समाज में अपराधों पर लगाम लगाना मुमकिन नहीं हो पाएगा। समाज में फैली इस पितृसत्तात्मक मानसिकता को बदलने के लिए अब कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर कड़े प्रयासों की आवश्यकता है।
पहनावे को लेकर रूढ़िवादी सोच पर करारा प्रहार
अक्सर समाज में यह देखने को मिलता है कि जब भी कोई आपराधिक घटना घटती है, तो सबसे पहले पीड़िता के कपड़ों, उसके बाहर निकलने के समय या उसके तौर-तरीकों पर सवाल उठाए जाते हैं। अदालत के इस फैसले ने इस प्रकार की दोषारोपण वाली सोच पर करारा प्रहार किया है। न्यायालय ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा सर्वोपरि है। महिलाओं को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वे क्या पहनें और कैसे जिएं। समाज की यह जिम्मेदारी है कि वह हर सार्वजनिक स्थान को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाए, न कि महिलाओं की आज़ादी पर ही पहरा बिठा दे। यह फैसला उन तमाम रूढ़िवादी धारणाओं को तोड़ने का काम करता है जो महिलाओं को हीन भावना से देखने का प्रयास करती हैं।
परवरिश और संस्कारों में बदलाव की सख्त जरूरत
इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश परिवार और अभिभावकों के लिए है। बच्चों की परवरिश के दौरान ही उनमें लैंगिक समानता और आपसी आदर के बीज बोने होंगे। स्कूलों और कॉलेजों में भी नैतिक शिक्षा के साथ-साथ जेंडर सेंसिटाइजेशन (लैंगिक संवेदनशीलता) के पाठ पढ़ाए जाने चाहिए ताकि युवा पीढ़ी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दे सके। जब लड़के बचपन से ही यह सीखेंगे कि महिलाओं का सम्मान करना उनका कर्तव्य है, तो वे भविष्य में एक सुरक्षित और सभ्य समाज के निर्माण में अपना अहम योगदान देंगे। कानून अपना काम कर रहा है, लेकिन वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब सामाजिक मानसिकता में सकारात्मक सुधार होगा।
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