
पिछले कई वर्षों से यूरोप के मैदानों को खून से रंग रहे और वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ चुके विनाशकारी रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए अब दुनिया की निगाहें भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति पर टिक गई हैं। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों, हथियारों की होड़ और कूटनीतिक गतिरोध के बीच भारत ने इस खूनी संघर्ष को थमाने के लिए एक बेहद व्यावहारिक, संतुलित और शांतिपूर्ण फॉर्मूला तैयार किया है, जिसकी गूंज अब वॉशिंगटन से लेकर मास्को और कीव तक सुनाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों और वैश्विक रणनीतिकारों का मानना है कि भारत की यह तटस्थ लेकिन मुखर मध्यस्थता नीति ही वह चाबी साबित हो सकती है जो इस भीषण युद्ध के ताले को खोल सकती है। जैसे-जैसे दुनिया के बड़े देश इस भारतीय शांति प्रस्ताव के समर्थन में आगे आ रहे हैं, वैसे-वैसे इस बात की उम्मीदें तेजी से बढ़ गई हैं कि जल्द ही इस खूनी संघर्ष के अंत की शुरुआत हो सकती है।
भारत ने इस भू-राजनीतिक संकट को हल करने के लिए जो कूटनीतिक रूपरेखा तैयार की है, वह पूरी तरह से बातचीत, संप्रभुता के सम्मान और मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मास्को और कीव की ऐतिहासिक यात्राओं के दौरान बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि यह दौर युद्ध का नहीं है और किसी भी समस्या का समाधान रणक्षेत्र में नहीं बल्कि केवल संवाद की मेज पर ही निकल सकता है। भारत के इस शांति प्लान के मुख्य बिंदुओं में संघर्ष विराम की तत्काल बहाली, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखना, और दोनों युद्धरत देशों के बीच आपसी भरोसे को बहाल करने के लिए बैक-चैनल कूटनीति का उपयोग करना शामिल है। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसके रूस के साथ दशकों पुराने गहरे रणनीतिक संबंध भी हैं और पश्चिमी देशों तथा यूक्रेन के साथ भी उसके व्यापारिक व कूटनीतिक रिश्ते बेहद मजबूत हैं, यही वजह है कि भारत दोनों पक्षों के बीच एक भरोसेमंद और स्वीकार्य मध्यस्थ की भूमिका निभाने की अनूठी क्षमता रखता है।
शुरुआती दौर में जब भारत ने रूस के साथ तेल व्यापार जारी रखने और युद्ध पर पश्चिमी दबाव के आगे झुकने से इनकार किया था, तब कई अमेरिकी और यूरोपीय थिंक टैंकों ने भारत की नीति पर सवाल उठाए थे। लेकिन समय के साथ यह साबित हो गया कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और ‘ग्लोबल साउथ’ के हितों की रक्षा करने का उसका संकल्प पूरी तरह सही था। आज स्थिति यह है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के कई प्रमुख नेता भी यह स्वीकार करने लगे हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की दिशा में भारत की मध्यस्थता सबसे अधिक प्रभावी साबित हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर भारत ने हमेशा विकासशील देशों पर इस युद्ध के कारण पड़ रहे महंगाई, खाद्यान्न संकट और ईंधन की कमी के बोझ को प्रमुखता से उठाया है, जिससे दुनिया भर के देशों में भारत के प्रति सम्मान और विश्वास में भारी इजाफा हुआ है।
भले ही रूस और यूक्रेन के बीच ज़मीन पर अभी भी तनाव कम होने के पूरे आसार तुरंत नजर नहीं आ रहे हों, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर जिस तरह से भारत के प्रस्तावों को तवज्जो दी जा रही है, उससे यह साफ हो गया है कि बातचीत का दायरा लगातार बढ़ रहा है। दोनों देशों की जनता और युद्ध से तबाह हुए यूरोपिय समाज अब इस बात को शिद्दत से महसूस करने लगे हैं कि हथियारों के बल पर इस जंग को हमेशा के लिए नहीं खींचा जा सकता। भारत की ओर से लगातार यह प्रयास किया जा रहा है कि रूस और यूक्रेन के शीर्ष नेतृत्व को किसी तीसरे तटस्थ स्थान पर एक मंच पर लाया जाए। यदि भारत का यह शांति फॉर्मूला अंततः सफल हो जाता है, तो यह आधुनिक विश्व इतिहास का सबसे बड़ा कूटनीतिक चमत्कार होगा, जो न केवल वैश्विक शांति की बहाली करेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत के सिर पर एक नया और गौरवशाली ताज भी सजा देगा।
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