रजिस्ट्री के कुछ ही दिन बाद फ्लैट बेचना और LTCG का पेंच: क्या कहता है कानून

भारतीय रियल एस्टेट बाजार और टैक्स प्रणाली में इन दिनों इनकम टैक्स अपीलेबल्स ट्रिब्यूनल (ITAT) का एक ऐसा फैसला सुर्खियों में छाया हुआ है, जिसने संपत्ति खरीद-फरोख्त करने वाले लाखों करदाताओं को बड़ी राहत और गहरी सोच में डाल दिया है। आमतौर पर आम आदमी और छोटे करदाताओं के मन में यह पक्का भ्रम रहता है कि यदि किसी अचल संपत्ति यानी फ्लैट या मकान की रजिस्ट्री कराने के कुछ ही दिनों या महीनों के भीतर उसे बेच दिया जाए, तो उस पर होने वाला मुनाफा हमेशा ‘शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन’ (STCG) के दायरे में ही आएगा और उस पर भारी-भरकम टैक्स चुकाना होगा। लेकिन, हाल ही में ITAT के सामने एक ऐसा अनोखा मामला आया, जहां एक करदाता ने फ्लैट की फाइनल रजिस्ट्री होने के महज 10 दिन के भीतर ही उसे आगे बेच दिया, इसके बावजूद ट्रिब्यूनल ने उसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) का फायदा दे दिया। इस फैसले के बाद टैक्स एक्सपर्ट्स और कानूनविदों के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है कि आखिर बहुत कम समय के अंतराल के बाद भी LTCG का लाभ कैसे संभव हो सकता है।

इस पूरे कानूनी विवाद की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि संबंधित करदाता ने उस फ्लैट की बुकिंग बहुत पहले ही करवा ली थी और बिल्डर के साथ एक वैधानिक बयाना या अलॉटमेंट एग्रीमेंट (Allotment Agreement) साइन कर लिया था, जिसके तहत उसने फ्लैट का बड़ा हिस्सा भुगतान करके उसका कब्जा और मालिकाना हक实质 रूप से हासिल कर लिया था। कानून के जानकारों के अनुसार, इनकम टैक्स एक्ट के तहत जब किसी संपत्ति के ‘होल्डिंग पीरियड’ (Holding Period) की गणना की जाती है, तो उसकी शुरुआत केवल अंतिम सेल डीड या रजिस्ट्री की तारीख से नहीं होती, बल्कि उस तारीख से गिनी जाती है जिस दिन करदाता ने उस संपत्ति पर कानूनी रूप से अपने अधिकार सुरक्षित कर लिए थे और उसका अलॉटमेंट लेटर प्राप्त कर लिया था। भले ही प्रशासनिक औपचारिकताएं और अंतिम रजिस्ट्री उसके महज 10 दिन पहले ही पूरी हुई हो, लेकिन कुल मिलाकर वास्तविक समय या होल्डिंग पीरियड दो साल की निर्धारित सीमा को पार कर चुका था। इसी तकनीकी और कानूनी आधार को मजबूत बनाते हुए करदाता ने अपनी टैक्स फाइलिंग में इस मुनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के रूप में दिखाया, जिसका इनकम टैक्स विभाग ने कड़ा विरोध किया था।

जब आयकर विभाग (Income Tax Department) ने करदाता के इस दावे की स्क्रूटनी की, तो अधिकारियों का तर्क था कि चूंकि अंतिम रजिस्ट्री और सेल डीड केवल 10 दिन पुरानी है, इसलिए इसे शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन मानकर उस पर टैक्स स्लैब के मुताबिक भारी टैक्स और जुर्माना वसूला जाना चाहिए। विभाग की इस दलील के खिलाफ करदाता ने कानूनी लड़ाई लड़ते हुए इनकम टैक्स अपीलेबल्स ट्रिब्यूनल (ITAT) का दरवाजा खटखटाया। ITAT के समक्ष करदाता के वकीलों ने अदालतों और उच्च न्यायलयों के कई पुराने और स्थापित फैसलों का हवाला देते हुए यह साबित किया कि संपत्ति पर मालिकाना हक का वास्तविक समय अलॉटमेंट एग्रीमेंट की तिथि से शुरू होता है, न कि केवल रजिस्ट्री की अंतिम मोहर लगने से। सभी पक्षों की दलीलों और दस्तावेजों की बारीकी से जांच करने के बाद ITAT ने करदाता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि वास्तविक नियंत्रण और अलॉटमेंट की अवधि नियत समय से अधिक है, तो महज अंतिम रजिस्ट्री के 10 दिन बाद बेचने से उसका चरित्र शॉर्ट टर्म में नहीं बदल जाता। इस फैसले ने करदाताओं को यह बता दिया है कि टैक्स कानूनों में तकनीकी व्याख्याओं का सही इस्तेमाल करके कैसे कानूनी सुरक्षा प्राप्त की जा सकती है।

ITAT का यह फैसला भारत के रियल एस्टेट निवेशकों और करदाताओं के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो रहा है। इसके जरिए यह सीख मिलती है कि प्रॉपर्टी खरीदते समय केवल रजिस्ट्री की तारीख ही नहीं, बल्कि हर एक कानूनी दस्तावेज, बिल्डर बायेर एग्रीमेंट और पेमेंट रसीद को सुरक्षित रखना कितना महत्वपूर्ण होता है। कई बार लोग छोटी-छोटी तकनीकी जानकारियों के अभाव में इनकम टैक्स अधिकारियों के सामने घुटने टेक देते हैं और बिना वजह भारी-भरकम टैक्स चुका देते हैं। यदि आपके पास भी ऐसे पुख्ता दस्तावेज मौजूद हैं जो यह साबित करते हैं कि संपत्ति आपके पास लंबे समय से वैधानिक रूप से थी, तो आप भी कानूनी प्रावधानों के तहत टैक्स बचाने का पूरा अधिकार रखते हैं। हालांकि, हर मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, इसलिए किसी भी वित्तीय या कर संबंधी फैसले को लेने से पहले योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) या टैक्स वकील से सलाह लेना हमेशा बुद्धिमानी माना जाता है।