‘ये कैसी हिपोक्रेसी?’ पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे ने UN Human Rights को दिखाया आईना

वैश्विक मानवाधिकार मंचों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के दोहरे रवैये पर भारतीय सेना के पूर्व चिनार कॉर्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) डीपी पांडे ने करारा प्रहार किया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) और अमरीकी समाचार पत्र ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ (NYT) की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग और चयनित चश्मे पर सवाल उठाते हुए पूर्व सैन्य अधिकारी ने पूछा है कि आखिर भारत के खिलाफ हर मुद्दे पर अपनी कथित निष्पक्षता का ढोल पीटने वाले ये वैश्विक संस्थान पश्चिमी देशों और आतंकवादी संगठनों की हिंसा पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं? लेफ्टिनेंट जनरल पांडे ने बेहद बेबाक अंदाज में कहा कि जब बात भारत की संप्रभुता और भारतीय सुरक्षा बलों के आतंकवाद विरोधी अभियानों की आती है, तो अंतरराष्ट्रीय मंच अचानक मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाने आ जाते हैं, लेकिन जब वही ताकतें दुनिया के अन्य हिस्सों में तबाही मचाती हैं, तो उनकी निष्पक्षता गायब हो जाती है। उनके इस तीखे बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों और मीडिया हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।

लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) डीपी पांडे, जिन्होंने कश्मीर घाटी में आतंकवाद-विरोधी अभियानों का सफल नेतृत्व किया है, ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के काम करने के तरीके पर गहरे सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी जमीन और नागरिकों की रक्षा में लगे भारतीय सैनिकों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रायोजित लगती हैं। कश्मीर जैसे संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में जब पाकिस्तानी सेना और समर्थित आतंकी गुट निर्दोष नागरिकों की हत्या करते हैं या सुरक्षा बलों को निशाना बनाते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार तंत्र मौन धारण कर लेता है। परंतु, जब भारतीय बल पूरी सतर्कता और मानवाधिकार मानदंडों का पालन करते हुए आतंकियों का सफाया करते हैं, तो तथाकथित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार रिपोर्टों में भारत को निशाना बनाया जाता है। उन्होंने इसे वैश्विक कूटनीति की सबसे बड़ी विडंबना और पाखंड करार दिया।

पूर्व सैन्य कमांडर ने अपने बयानों में पश्चिमी मीडिया संस्थान ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ को आड़े हाथों लेते हुए गंभीर सवाल दागे। उन्होंने पूछा कि पश्चिमी मीडिया संस्थान भारत के आंतरिक मामलों, क्षेत्रीय संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर बार-बार पक्षपातपूर्ण और सनसनीखेज खबरें क्यों गढ़ते हैं। जब दुनिया के शक्तिशाली देश अपने हितों के नाम पर दूसरे देशों पर हमले करते हैं या सैन्य कार्रवाई करते हैं, तब न्यू यॉर्क टाइम्स जैसी मीडिया संस्थाएं उसे ‘लोकतंत्र की रक्षा’ या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर जायज ठहराती हैं। इसके ठीक विपरीत, जब भारत अपनी भौगोलिक अखंडता और निर्दोष जनता की सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा में कदम उठाता है, तो उसी पश्चिमी मीडिया की नजरों में यह मानवाधिकारों का हनन बन जाता है। इस दोहरे रवैये (Double Standards) को अब भारत की नई पीढ़ी और बौद्धिक वर्ग पूरी तरह समझ चुका है।

लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे का यह आक्रामक और तर्कसंगत रुख इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गढ़े जाने वाले भारत-विरोधी विमर्श (Anti-India Narrative) का माकूल जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने कहा कि वैश्विक संस्थानों को यह समझना होगा कि 21वीं सदी का भारत अब किसी के दबाव या झूठे एजेंडे के आगे झुकने वाला नहीं है। भारत का मानवाधिकार रिकॉर्ड और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया की सबसे पारदर्शी और मजबूत व्यवस्थाओं में से एक है। भारतीय सेना का मानवाधिकारों के प्रति समर्पण बेमिसाल है और सुरक्षा बलों की हर कार्रवाई पूरी तरह से कानूनी ढांचे के भीतर होती है। ऐसे में पश्चिमी मीडिया और संयुक्त राष्ट्र के निकायों को भारत को उपदेश देने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।