यूपी की सियासत में बड़ा खेल: चंद्रशेखर और ओवैसी से दूरी क्यों बना रहे अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश की राजनीति और आगामी चुनावों को लेकर सियासी गलियारों में इस समय सबसे बड़ी चर्चा समाजवादी पार्टी (सपा) के गठबंधन के इर्द-गिर्द घूम रही है। लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। राजनीतिक हलकों में यह सवाल तेजी से तैर रहा है कि दलित राजनीति का उभरता हुआ चेहरा माने जाने वाले चंद्रशेखर आज़ाद और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) को अखिलेश यादव अपने पाले में क्यों नहीं लाना चाहते हैं। पहली नजर में मजबूत दिखने वाले इन नेताओं को गठबंधन से दूर रखने के पीछे अखिलेश यादव की एक बहुत ही सोची-समझी रणनीतिक योजना और कुछ गहरे सियासी डर छिपे हुए हैं।

दलित वोट बैंक पर चंद्रशेखर की पकड़ से सपा को क्या है खतरा

आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी एक मजबूत जमीन तैयार कर ली है। दलित युवाओं के बीच उनका क्रेज लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अखिलेश यादव को सबसे बड़ा डर यह सता रहा है कि यदि वे चंद्रशेखर को अपने साथ गठबंधन में शामिल करते हैं, तो सपा के पारंपरिक कोर वोट बैंक के भीतर एक नया पावर सेंटर खड़ा हो सकता है। सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि मायावती की बसपा के कमजोर होने के बाद जो गैर-जाटव दलित वोट समाजवादी पार्टी की ओर आकर्षित हो रहा है, चंद्रशेखर के साथ आने से वह वोट बैंक पूरी तरह आज़ाद समाज पार्टी की तरफ शिफ्ट हो सकता है। अखिलेश नहीं चाहते कि उनके अपने ही गठबंधन में कोई दूसरा नेता दलितों के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरकर उनके नेतृत्व को चुनौती दे।

असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री से क्यों बच रहे हैं अखिलेश यादव

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) को गठबंधन में शामिल न करने के पीछे समाजवादी पार्टी का डर बिल्कुल अलग है। यूपी की सियासत में मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से सपा का सबसे मजबूत आधार रहे हैं। अखिलेश यादव को लगता है कि अगर ओवैसी उनके साथ मंच साझा करते हैं, तो बीजेपी (BJP) को चुनावों का ध्रुवीकरण करने का सीधा मौका मिल जाएगा। ओवैसी के आक्रामक बयानों को ढाल बनाकर विपक्षी दल बहुसंख्यक समाज के वोटों को एकजुट कर सकते हैं, जिससे सपा की ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) सोशल इंजीनियरिंग को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा, सपा मुस्लिम नेतृत्व का कंट्रोल पूरी तरह अपने हाथ में रखना चाहती है, जिसे ओवैसी की मौजूदगी कमजोर कर सकती है।

वोट शेयर और सीटों के बंटवारे का जटिल गणित

गठबंधन की राजनीति में एक सबसे बड़ी समस्या सीटों के तालमेल को लेकर आती है। चंद्रशेखर आज़ाद और ओवैसी, दोनों ही अपनी-अपनी पार्टी के विस्तार के लिए यूपी के चुनावों में एक बड़ी संख्या में सीटों की मांग कर सकते हैं। अखिलेश यादव को लगता है कि छोटे दलों को ज्यादा सीटें देने का मतलब है कि समाजवादी पार्टी के अपने कद्दावर और निष्ठावान नेताओं का टिकट काटना पड़ेगा। पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल के कई जिलों में सपा के अपने मजबूत उम्मीदवार हैं जो किसी भी बाहरी दल के लिए अपनी सीट छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में टिकट बंटवारे के समय होने वाले आंतरिक विद्रोह से बचने के लिए अखिलेश सीधे तौर पर इन दोनों नेताओं से दूरी बनाकर रखना ज्यादा सुरक्षित समझ रहे हैं।

पीडीए (PDA) फॉर्मूले को बिना किसी दखल के चलाना चाहते हैं अखिलेश

अखिलेश यादव का पूरा ध्यान इस समय अपने खुद के बनाए ‘पीडीए’ फॉर्मूले पर केंद्रित है। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने सपा को यह भरोसा दिया है कि वे बिना किसी बड़े चेहरे की बैसाखी के भी दलितों और पिछड़ों का विश्वास जीत सकते हैं। अखिलेश का मानना है कि चंद्रशेखर या ओवैसी जैसे स्थापित और महत्वाकांक्षी नेताओं को साथ लेने के बजाय, वे इन कम्युनिटी के स्थानीय और जमीनी नेताओं को सीधे सपा में शामिल कराएं। ऐसा करने से गठबंधन के भीतर कोई आंतरिक कलह भी नहीं होगी और समाजवादी पार्टी का नेतृत्व पूरी तरह से सुरक्षित रहेगा। यही वह चक्रव्यूह है जिसके सहारे अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की सत्ता पर दोबारा काबिज होने का सपना देख रहे हैं।