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‘मुझे लगा मेरा करियर खत्म हो गया…’: जब चीनी सेना ने भारतीय एजेंटों को दबोच लिया था, NSA अजीत डोभाल ने सुनाया वो रोंगटे खड़े करने वाला किस्सा

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को देश के रणनीतिक और खुफिया इतिहास का सबसे कुशल ‘मास्टरमाइंड’ माना जाता है। पाकिस्तान में वर्षों तक अंडरकवर रहने से लेकर मिजोरम, पंजाब और कश्मीर में अलगाववाद की कमर तोड़ने तक, उनके नाम कई ऐतिहासिक खुफिया ऑपरेशंस दर्ज हैं। लेकिन पर्दे के पीछे चलने वाली इस जासूसी की दुनिया में हर मिशन सीधा या आसान नहीं होता। कई बार ऐसे मोड़ भी आते हैं जब एक छोटी सी चूक पूरे मिशन के साथ-साथ जिंदगी और करियर को दांव पर लगा देती है।

हाल ही में अजीत डोभाल ने अपने शुरुआती सेवाकाल और पूर्वोत्तर सीमा के एक बेहद संवेदनशील मिशन से जुड़ा ऐसा ही एक रोंगटे खड़े कर देने वाला संस्मरण साझा किया। उन्होंने उस खौफनाक दौर को याद करते हुए बताया कि एक वक्त ऐसा आ गया था जब उनके द्वारा तैयार किए गए भारतीय फील्ड एजेंटों को चीनी सेना और सीमा पार के विद्रोही तत्वों ने रंगे हाथों पकड़ लिया था। उस पल डोभाल को लगा था कि अब उनका पूरा करियर और साख हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है।

यह पूरा वाकया उस दौर का है जब भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र उग्रवाद और विदेशी हस्तक्षेप की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा था। उस समय विद्रोही गुटों के लड़ाके म्यांमार और चीन की सीमा पार जाकर हथियारों की ट्रेनिंग लेते थे और हथियारों का भारी जखीरा लेकर भारतीय सीमा में घुसपैठ करते थे। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के एक युवा और तेजतर्रार फील्ड ऑफिसर के रूप में अजीत डोभाल को इस पूरे क्रॉस-बॉर्डर सिंडिकेट की टोह लेने और उनकी सप्लाई लाइन को ट्रैक करने का अति-गोपनीय जिम्मा सौंपा गया था।

डोभाल ने महीनों की मशक्कत और जोखिम उठाकर स्थानीय सीमावर्ती इलाकों से कुछ ऐसे लोगों को अपने नेटवर्क में शामिल किया, जो चीन और म्यांमार के ट्रेनिंग कैंपों तक पहुंच बना सकते थे। इन ‘एसेट्स’ (खुफिया मुखबिरों) को पूरी ब्रीफिंग देकर सीमा पार भेजा गया था ताकि वे चीनी सैन्य अधिकारियों के साथ विद्रोही कमांडरों की बैठकों, हथियारों के प्रकार और उनकी रूट मैपिंग की सटीक जानकारी जुटा सकें।

मिशन अपनी योजना के अनुसार आगे बढ़ रहा था, लेकिन विदेशी जमीन पर खुफिया ऑपरेशंस में अप्रत्याशित खतरे हमेशा सिर पर मंडराते रहते हैं। डोभाल के एजेंट सीमा पार संदिग्ध हलचलों को रिकॉर्ड कर रहे थे, तभी चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के गश्ती दल और स्थानीय उग्रवादी कैडरों को उनकी गतिविधियों पर शक हो गया।

कुछ ही घंटों के भीतर चीनी सुरक्षा तंत्र ने घेराबंदी करके उन भारतीय एजेंटों को हिरासत में ले लिया। सीमा पार से आने वाले इनपुट्स और रेडियो सिग्नल अचानक बंद हो गए। जब मुख्यालय को यह खुफिया संदेश मिला कि उनके द्वारा भेजे गए फील्ड ऑपरेटिव्स को चीनी सेना ने पकड़ लिया है और उनकी सघन पूछताछ शुरू हो चुकी है, तो सुरक्षा एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों के होश उड़ गए।

उस तनावपूर्ण घटनाक्रम को याद करते हुए अजीत डोभाल ने बताया कि वह उनके जीवन की सबसे लंबी और डरावनी रात थी। एक खुफिया अधिकारी के लिए अपने सोर्स या एजेंट का दुश्मन के हाथों पकड़ा जाना पेशेवर रूप से सबसे बड़ा झटका होता है। यदि पूछताछ के दौरान वे एजेंट टूट जाते और भारतीय खुफिया नेटवर्क के संचालन का खुलासा हो जाता, तो यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बखेड़ा खड़ा कर सकता था।

डोभाल ने कहा, “उस पल मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात कौंध रही थी—मुझे लगा मेरा करियर अब पूरी तरह खत्म हो गया है। न केवल मेरी नौकरी और वर्षों की मेहनत दांव पर थी, बल्कि उन लोगों की जान भी खतरे में थी जिन्होंने मेरे कहने पर अपनी जिंदगी दांव पर लगाई थी। विफलता की उस आशंका ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था।”

ऐसी विषम परिस्थितियों में अधिकांश लोग घबराकर पीछे हट जाते हैं, लेकिन अजीत डोभाल ने हार मानने के बजाय तुरंत एक जोखिम भरा ‘काउंटर-प्लान’ तैयार किया। उन्होंने स्थानीय कबायली संपर्कों, सीमावर्ती विद्रोही गुटों के आंतरिक मतभेदों और अपने गहरे संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए एक समानांतर मनोवैज्ञानिक रणनीति बनाई।

उन्होंने इस बात की पुष्टि करने के लिए अपने बैकअप चैनलों को सक्रिय किया कि पकड़े गए लोग केवल साधारण स्थानीय व्यापारी या गाइड के रूप में ही अपनी पहचान बनाए रखें और किसी भी कीमत पर भारत के आधिकारिक खुफिया तंत्र का नाम सामने न आए। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर ऐसा माहौल बनाया गया जिससे चीनी अधिकारियों को यह विश्वास हो जाए कि पकड़े गए लोग किसी बड़ी जासूसी का हिस्सा नहीं, बल्कि अनजाने में रास्ता भटक कर प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुंचे स्थानीय ग्रामीण हैं। बैक-चैनल संपर्कों और गहन कूटनीतिक सूझबूझ के चलते आखिरकार उन एजेंटों को बिना किसी गंभीर नुकसान के वापस सुरक्षित निकालने में सफलता मिली।

अजीत डोभाल द्वारा सुनाया गया यह किस्सा केवल एक पुरानी याद नहीं है, बल्कि यह वर्तमान में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया तंत्र की जटिलताओं को समझने का एक बड़ा आईना है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित मध्य कमान (Central Command) के रणनीतिकारों से लेकर नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक तक, रक्षा और खुफिया विशेषज्ञ हमेशा इस बात को रेखांकित करते हैं कि चीन की सीमाओं पर खुफिया संतुलन साधना दुनिया के सबसे कठिन कार्यों में से एक है।

पूर्वोत्तर के राज्यों (असम, नगालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश) में सुरक्षा की मौजूदा स्थिरता के पीछे डोभाल जैसे अधिकारियों के दशकों के ऐसे ही अनकहे और जोखिम भरे ऑपरेशंस की रीढ़ रही है। वर्तमान दौर में जब वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के साथ तनाव और सैन्य गतिरोध बना रहता है, डोभाल का यह अनुभव नई पीढ़ी के सैन्य कमांडरों और खुफिया अधिकारियों को यह सिखाता है कि संकट के सबसे अंधेरे पलों में भी संयम और रणनीतिक धैर्य कैसे बनाए रखा जाता है।

अजीत डोभाल का यह संस्मरण यह साबित करता है कि आज जिस ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ की चर्चा पूरी दुनिया में होती है, वह किसी वातानुकूलित कमरे में बैठकर नहीं गढ़ी गई है। इसके पीछे जमीनी स्तर पर विफलता के डर, करियर के खात्मे की आशंकाओं और मौत के मुंह से वापस लौटने के दर्जनों कड़वे अनुभव शामिल हैं।

डोभाल ने युवाओं और भावी अधिकारियों को संदेश देते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों को व्यक्तिगत लाभ, पद या करियर की चिंता छोड़कर देशहित को सर्वोपरि रखना पड़ता है। जब तक आप बड़ा जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने वाली रणनीतिक बढ़त हासिल नहीं की जा सकती।