
महानगरों और आधुनिक रिहायशी सोसायटियों में फ्लैट खरीदार सबसे ज्यादा जिस समस्या से जूझते हैं, वह है कार पार्किंग का अभाव। लेकिन सोचिए अगर आपकी पूरी बिल्डिंग या सोसाइटी के सारे के सारे पार्किंग स्पेस कोई एक ही शख्स खरीद ले और आपको अपनी ही गाड़ी खड़ी करने के लिए मोहताज कर दे, तो क्या होगा? ऐसा ही एक हैरतअंगेज और विवादित मामला सामने आया है, जिसने रियल एस्टेट सेक्टर और कानून के जानकारों को भी चकित कर दिया है। एक बेहद रईस महिला निवेशक ने एक बड़ी बहुमंजिला हाउसिंग सोसाइटी के अंडरग्राउंड गैरेज में मौजूद कुल 196 पार्किंग स्पॉट्स को एकमुश्त करीब 14.48 करोड़ रुपये (स्थानीय मुद्रा के रूपांतरण अनुसार) का भुगतान करके खरीद लिया। शुरुआत में बिल्डर और डेवलपर ने इसे एक सामान्य कमर्शियल डील समझकर सभी स्लॉट्स की ओनरशिप महिला के नाम ट्रांसफर कर दी, लेकिन इसके कुछ ही हफ्तों बाद सोसाइटी में ऐसा विवाद खड़ा हुआ कि पड़ोसियों के बीच की शांति पूरी तरह खत्म हो गई और मामला सीधे अदालत की दहलीज पर पहुंच गया।
196 पार्किंग स्लॉट्स की कानूनी मालिक बनने के बाद उस महिला ने पूरी पार्किंग लॉट को अपने निजी नियंत्रण में लेने के लिए सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए। उसने सभी 196 स्पॉट्स पर लोहे के मजबूत खंभे (बैलार्ड्स) खड़े करवा दिए और उन पर भारी-भरकम जंजीरें और ताले जड़वा दिए, ताकि कोई भी अन्य निवासी गलती से भी वहां अपनी गाड़ी पार्क न कर सके। जिन परिवारों के पास सोसाइटी में फ्लैट्स थे लेकिन उन्होंने पहले पार्किंग स्पेस नहीं खरीदा था और वे खाली जगहों पर अपनी गाड़ियां खड़ी कर रहे थे, उनके सामने अचानक गंभीर संकट खड़ा हो गया। सैकड़ों गाड़ियों को सोसाइटी के बेसमेंट से बेदखल कर दिया गया, जिसके चलते लोगों को अपनी महंगी गाड़ियां बाहर मुख्य सड़कों, गलियों और अवैध स्थानों पर खड़ी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे न केवल गाड़ियों में तोड़फोड़ और चोरी का खतरा बढ़ गया, बल्कि ट्रैफिक जाम और आए दिन चालान कटने की नौबत आ गई, जिससे फ्लैट मालिकों में गहरा आक्रोश फैल गया।
जब नाराज फ्लैट मालिकों और रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) के पदाधिकारियों ने महिला से बातचीत करने की कोशिश की, तो महिला का रुख बेहद आक्रामक और व्यापारिक था। उसने साफ शब्दों में कहा कि चूंकि उसने कानूनी तौर पर बिल्डर को पूरी रकम देकर ये स्लॉट्स खरीदे हैं, इसलिए यह उसकी निजी मिल्कियत (प्राइवेट प्रॉपर्टी) है। महिला ने इन पार्किंग स्पॉट्स को मूल निवासियों को सामान्य दरों पर बेचने से साफ इनकार कर दिया और बदले में उनसे बाजार भाव से तीन से चार गुना अधिक मासिक किराया वसूलने की शर्त रख दी। महिला ने प्रति स्लॉट इतना भारी किराया तय किया कि आम मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए उसे चुकाना नामुमकिन था। निवासियों का आरोप था कि महिला ने सुनियोजित तरीके से पूरी सोसाइटी की पार्किंग पर एकाधिकार (Monopoly) स्थापित किया ताकि वह कृत्रिम संकट (आर्टिफिशियल क्राइसिस) पैदा करके अपनी मर्जी का किराया वसूल सके और भारी मुनाफा कमा सके।
महीनों तक चले इस गतिरोध के बाद निवासियों का धैर्य जवाब दे गया। कई फ्लैट मालिकों ने पार्किंग एरिया में जाकर लगाए गए लोहे के खंभों और जंजीरों को उखाड़ फेंका और जबरन अपनी कारें पार्क करना शुरू कर दिया। इसके जवाब में महिला ने इसे अपनी निजी संपत्ति पर अतिक्रमण और तोड़फोड़ करार देते हुए स्थानीय पुलिस में दर्जनों निवासियों के खिलाफ आपराधिक शिकायतें दर्ज करवा दीं। सोसाइटी में हर रोज सुरक्षा गार्ड्स, पुलिस अधिकारियों और स्थानीय निवासियों के बीच तीखी नोकझोंक और हंगामे की स्थिति बनने लगी। माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि बिल्डर ने भी बीच-बचाव करने से हाथ खड़े कर दिए और कहा कि रजिस्ट्री पूरी हो जाने के बाद उसका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है। आखिरकार, जब बातचीत के सारे रास्ते बंद हो गए, तो आक्रोशित निवासियों के समूह ने एक होकर महिला और बिल्डर दोनों के खिलाफ अदालत में एक संयुक्त दीवानी याचिका (सिविल सूट) दायर कर दी।
अदालत में दायर याचिका में निवासियों ने तर्क दिया कि किसी भी रिहायशी हाउसिंग प्रोजेक्ट में पार्किंग स्पेस केवल एक सामान्य व्यावसायिक संपत्ति नहीं होती, बल्कि वह पूरे प्रोजेक्ट की आवश्यक बुनियादी सुविधा (कॉमन सिविक एमेनिटी) का हिस्सा होती है। निवासियों के वकीलों ने दलील दी कि रियल एस्टेट नियमों के तहत पार्किंग स्लॉट्स मुख्य रूप से उसी इमारत में रहने वाले फ्लैट मालिकों के उपयोग के लिए बनाए जाते हैं, न कि किसी बाहरी निवेशक द्वारा अनुचित मुनाफाखोरी और ब्लैकमेलिंग का हथियार बनाने के लिए। याचिका में बिल्डर पर भी यह आरोप लगाया गया कि उसने अपने त्वरित वित्तीय लाभ के लिए निवासियों के बुनियादी अधिकारों की अनदेखी की और थोक में पार्किंग बेच दी। दूसरी ओर, महिला के वकीलों का कहना था कि चूंकि बिक्री वैध अनुबंध और कानूनी दस्तावेजों के तहत हुई है, इसलिए संपत्ति के मालिक को अपने अधिकार की रक्षा करने और अपने मनमुताबिक किराया तय करने का पूरा विधिक अधिकार है।
यह मामला अब केवल एक सोसाइटी का व्यक्तिगत झगड़ा नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया भर के रियल एस्टेट और शहरी नियोजन विशेषज्ञों के लिए एक बड़ा कानूनी नजीर बन चुका है। भारत समेत कई देशों में रेरा (RERA) और सुप्रीम कोर्ट के कई स्पष्ट फैसलों में यह व्यवस्था दी गई है कि रिहायशी इमारतों में स्टिल्ट या ओपन पार्किंग स्पेस को बिल्डर द्वारा किसी बाहरी व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से नहीं बेचा जा सकता और यह कॉमन एरिया का हिस्सा मानी जाती है। हालांकि, जहां कानून में अस्पष्टता होती है, वहां पूंजीपति इस तरह की खामियों का फायदा उठाकर आम जनता की दैनिक जिंदगी को बंधक बना लेते हैं। अदालत द्वारा इस मामले में अंतिम फैसला आना अभी बाकी है, लेकिन इस विवाद ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी सोसाइटी में घर खरीदते समय पार्किंग के मालिकाना हक, कॉमन एरिया डीड और आरडब्ल्यूए के उप-नियमों की बारीकी से जांच करना कितना अनिवार्य है।
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