
दक्षिण एशिया के दो पड़ोसी मुल्कों—भारत और पाकिस्तान—में इस समय चीनी के बाजार को लेकर बिल्कुल विपरीत और हैरान करने वाली आर्थिक तस्वीर देखने को मिल रही है। भारत में जहां खुदरा बाजार में चीनी की कीमतें ₹60 प्रति किलोग्राम के स्तर को पार कर आम उपभोक्ता की जेब पर दबाव बना रही हैं, वहीं गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अपनी महंगी लागत से तैयार चीनी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी घाटा और सब्सिडी देकर सस्ते दामों में बेचने पर विवश है। दोनों देशों की कृषि नीतियों, सरकारी प्राथमिकताओं और विदेशी मुद्रा जरूरतों के चलते यह विरोधाभास पैदा हुआ है।
भारत में चीनी की कीमतें ₹60 के पार क्यों पहुंचीं?
भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता और प्रमुख उत्पादक देश है। घरेलू बाजार में कीमतों में आए हालिया उछाल के पीछे कई नीतिगत और मौसमी कारक जिम्मेदार हैं:
-
एथनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (EBP): भारत सरकार ने पेट्रोल में 20% एथनॉल मिश्रण के लक्ष्य को पूरा करने के लिए गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे (B-Heavy Molasses) के बड़े हिस्से को सीधे एथनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया है। इससे घरेलू बाजार के लिए शुद्ध चीनी के उत्पादन में आनुपातिक कमी आई है।
-
प्रमुख राज्यों में उत्पादन पर असर: महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में पिछले मौसम में अनियमित मानसूनी बारिश और सूखे के कारण गन्ने की कुल पैदावार प्रभावित हुई।
-
गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) में वृद्धि: किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा घोषित एफआरपी में लगातार बढ़ोतरी की गई है, जिससे मिलों की इनपुट लागत बढ़ी है।
-
निर्यात पर सख्त प्रतिबंध: घरेलू बाजार में त्योहारी मांग और खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने चीनी के अनियंत्रित निर्यात पर कड़े नियम लागू किए हैं।
पाकिस्तान महंगी चीनी सस्ते में बेचने को क्यों मजबूर है?
इसके ठीक विपरीत, पाकिस्तान में हालात बिल्कुल उल्टे हैं। वहां स्थानीय उत्पादन लागत काफी ऊंची होने के बावजूद सरकार और मिल मालिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में औने-पौने दामों पर चीनी निर्यात कर रहे हैं:
-
विदेशी मुद्रा (Forex) की भारी किल्लत: पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक में विदेशी मुद्रा भंडार की गंभीर कमी है। देश को आयात बिल चुकाने और डिफॉल्ट से बचने के लिए तुरंत डॉलर की जरूरत है, जिसके चलते नुकसान उठाकर भी निर्यात किया जा रहा है।
-
घरेलू अधिशेष और स्टोरेज संकट: पाकिस्तान में स्थानीय स्तर पर गन्ने की अधिक पिराई के बाद भारी स्टॉक जमा हो गया। मिलों के पास अगली फसल के भुगतान के लिए नकदी का टोटा पड़ गया, जिससे सरकार को प्रति किलोग्राम सब्सिडी देकर निर्यात की अनुमति देनी पड़ी।
-
मिल लॉबी और राजनीतिक दबाव: पाकिस्तान के चीनी उद्योग पर वहां के बड़े राजनीतिक घरानों और प्रभावशाली मिल मालिकों का दबदबा है। मिलों की तरलता (Liquidity) बनाए रखने के लिए टैक्सपेयर्स के पैसे से अरबों रुपये की सब्सिडी देकर वैश्विक स्तर पर कम कीमत पर चीनी बेची जा रही है।
नीतिगत प्राथमिकताओं का अंतर: खाद्य सुरक्षा बनाम विदेशी मुद्रा की मजबूरी
दोनों देशों की यह विपरीत स्थिति उनकी अर्थव्यवस्था की प्राथमिकताओं को दर्शाती है।
भारत की रणनीति ऊर्जा सुरक्षा (एथनॉल के जरिए तेल आयात घटाना), किसानों को बेहतर मूल्य दिलाना और देश के भीतर 140 करोड़ नागरिकों के लिए बफर स्टॉक सुरक्षित रखना है। भले ही इससे अल्पावधि में कीमतें ₹55-₹62 प्रति किलो के दायरे में दिख रही हैं, लेकिन घरेलू आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह स्थिर है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था और डॉलर की तात्कालिक जरूरत के कारण अपने ही देश के खजाने पर सब्सिडी का बोझ डालकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में घाटे का सौदा करने के लिए लाचार बना हुआ है।
girls globe