भारत बना दुनिया का नंबर-1 नारियल उत्पादक देश: ग्लोबल मार्केट में 31.24% हिस्सेदारी, जानें किस राज्य का है सबसे बड़ा दबदबा

कृषि प्रधान भारत ने वैश्विक मंच पर एक और ऐतिहासिक मुकाम हासिल कर लिया है। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों और केंद्रीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश बन गया है। दुनिया भर में पैदा होने वाले कुल नारियल में अकेले भारत की हिस्सेदारी 31.24 प्रतिशत दर्ज की गई है। वहीं, खेती के कुल क्षेत्रफल के मामले में भारत 17.90 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ वैश्विक स्तर पर तीसरे पायदान पर काबिज है। इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे पारंपरिक नारियल उत्पादक देशों को पीछे छोड़ते हुए भारत ने न केवल उत्पादन में बाजी मारी है, बल्कि नारियल आधारित वैल्यू-एडेड उत्पादों के वैश्विक निर्यात में भी नया रिकॉर्ड कायम किया है। देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सांस्कृतिक विरासत और तटीय आजीविका में ‘कल्पवृक्ष’ कहलाने वाला नारियल आज लाखों किसानों की आय का मुख्य आधार बन चुका है।

नारियल उत्पादन और क्षेत्रफल में कौन-सा राज्य है सबसे आगे?

भारत के भीतर नारियल के कुल उत्पादन, खेती के रकबे और उत्पादकता को लेकर राज्यों के बीच एक बेहद दिलचस्प और सकारात्मक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। कुल उत्पादन (Total Production) के मामले में तमिलनाडु देश का सबसे अग्रणी राज्य बना हुआ है। तमिलनाडु की उपजाऊ जलवायु, उन्नत सिंचाई तकनीक और किसानों द्वारा आधुनिक सस्य पद्धतियां अपनाने से वहां नारियल का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है। दूसरी तरफ, कर्नाटक भी शीर्ष उत्पादक राज्यों की दौड़ में तमिलनाडु को कड़ी टक्कर दे रहा है।

खेती के कुल क्षेत्रफल (Cultivation Area) की बात करें तो ‘नारियल की भूमि’ कहे जाने वाले केरल (केरलम) के पास सबसे बड़ा रकबा है। केरल में करीब 7.54 लाख हेक्टेयर भूमि पर नारियल के बागान फैले हुए हैं, जहां से सालाना 5,149 मिलियन से अधिक नारियल प्राप्त होते हैं। वहीं, प्रति हेक्टेयर सबसे ज्यादा पैदावार यानी उत्पादकता (Productivity) के मामले में आंध्र प्रदेश पूरे देश में पहले स्थान पर है, जिसके बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का नंबर आता है।

देश में 20,300 मिलियन से अधिक नारियल की बंपर पैदावार

हालिया कृषि आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 2.19 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल से 20,301 मिलियन से अधिक नारियल का वार्षिक उत्पादन दर्ज किया गया है। इस दौरान देश की औसत उत्पादकता 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही है। सरकार ने नारियल विकास बोर्ड (CDB) के जरिए पारंपरिक तटीय राज्यों से इतर गैर-पारंपरिक क्षेत्रों जैसे छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर राज्यों और ओडिशा के नए इलाकों में भी नारियल की खेती का विस्तार किया है। बागानों के पुनरुद्धार और नई पौध रोपण के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई है, जिससे सीधे तौर पर हजारों छोटे और सीमांत किसानों को लाभ मिला है।

3 करोड़ लोगों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़

भारत का नारियल क्षेत्र केवल एक कृषि फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक विशाल सामाजिक-आर्थिक तंत्र को संचालित करता है। देश के लगभग 1 करोड़ किसान सीधे तौर पर इसकी खेती से जुड़े हैं, जबकि प्रसंस्करण, ढुलाई, पैकेजिंग और खुदरा कारोबार को मिलाकर 3 करोड़ से अधिक लोगों की रोजी-रोटी नारियल उद्योग पर निर्भर करती है। नारियल का हर हिस्सा—चाहे वह फल हो, नारियल पानी, रेशा (कॉयर), या खोल (शेल)—किसी न किसी उद्योग में कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है, जिससे ग्रामीण स्तर पर बड़े पैमाने पर सूक्ष्म और लघु उद्यम फल-फूल रहे हैं।

पारंपरिक कोपरा से आगे: वर्जिन कोकोनट ऑयल और एक्टिवेटेड कार्बन का जलवा

वैश्विक व्यापार में भारत की पहचान अब केवल कच्चे नारियल या सूखे कोपरा (Copra) के आपूर्तिकर्ता की नहीं रही। भारत ने अपनी निर्यात टोकरी का आधुनिकीकरण करते हुए उच्च मूल्य वाले उत्पादों पर ध्यान केंद्रित किया है। आज अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय वर्जिन कोकोनट ऑयल (VCO), पैकेज्ड नारियल पानी, कोकोनट मिल्क पाउडर, नारियल का आटा और नारियल के खोल से बनने वाले ‘एक्टिवेटेड कार्बन’ की भारी मांग है। एक्टिवेटेड कार्बन का उपयोग वैश्विक स्तर पर जल शोधन, वायु फिल्टर और औद्योगिक प्रक्रियाओं में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिसमें भारत एक प्रमुख वैश्विक निर्यातक के रूप में उभरा है।

निर्यात में 62% की छलांग: ₹7,000 करोड़ के पार पहुंचा विदेशी कारोबार

मूल्य संवर्धन (Value Addition) पर दिए गए जोर का सीधा असर भारत के निर्यात आंकड़ों पर साफ दिखाई दे रहा है। नारियल और इसके सह-उत्पादों का वार्षिक निर्यात ₹7,038 करोड़ (लगभग 794 मिलियन डॉलर) के स्तर को पार कर गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 62 प्रतिशत की शानदार वृद्धि को दर्शाता है। वर्ष 2001-02 में जहां भारत का नारियल निर्यात मात्र ₹25 करोड़ के आसपास था, वहीं अब यह 8,700 से अधिक पंजीकृत निर्यातकों के साथ एक संगठित और तीव्र गति से बढ़ता उद्योग बन चुका है। भारत सरकार का लक्ष्य देश के समग्र कृषि और विनिर्माण निर्यात के साथ तालमेल बिठाते हुए नारियल क्षेत्र के वैश्विक व्यापार को आने वाले वर्षों में नए शिखरों तक पहुंचाना है।

‘नारियल संवर्धन योजना’ और नीतिगत समर्थन

किसानों की आय को दोगुना करने और बागानों को कीट-रोगों से बचाने के लिए सरकार ने केंद्रीय बजट में ‘नारियल संवर्धन योजना’ की शुरुआत की है। इस योजना के तहत पुराने और कम उपज देने वाले पेड़ों को हटाकर उच्च गुणवत्ता वाली संकर (Hybrid) किस्मों के पौधे लगाने, जल संरक्षण के लिए ड्रिप सिंचाई अपनाने और किसानों के उत्पादक संगठन (FPO) बनाकर सीधे प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए सब्सिडी दी जा रही है। इसके अलावा, कोपरा को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के दायरे में बनाए रखकर किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से वित्तीय सुरक्षा प्रदान की जा रही है। निरंतर नीतिगत सहयोग, मजबूत वैज्ञानिक अनुसंधान और वैश्विक मांग के चलते भारत का नारियल क्षेत्र आने वाले समय में देश की कृषि जीडीपी में और भी बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।