
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और पश्चिमी सीमाओं पर बख्तरबंद खतरों से निपटने की दिशा में भारतीय सेना ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक कदम उठाया है। भारत ने अमेरिका से दुनिया के सबसे घातक और युद्ध-परीक्षित एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) सिस्टम ‘जेवलिन’ (FGM-148 Javelin) को खरीदने के लिए औपचारिक रूप से ऑफर एंड एक्सेप्टेंस लेटर (LOA) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। अमेरिकी विदेश विभाग की मंजूरी के बाद फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) प्रोग्राम के तहत हुए इस सौदे की अनुमानित लागत लगभग 45.7 मिलियन डॉलर तय की गई है।
यह रक्षा समझौता केवल सीधे हथियारों की खरीद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य में भारत के भीतर ही जेवलिन मिसाइलों के सह-उत्पादन (Co-Production) का रास्ता भी खोलता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में आधुनिक मुख्य युद्धक टैंकों (Main Battle Tanks) को पलक झपकते ही नष्ट करके दुनिया भर में सुर्खियां बटोरने वाली जेवलिन मिसाइलें अब भारतीय पैदल सेना (Infantry) और विशेष बलों (Special Forces) के तरकश का मुख्य तीर बनेंगी।
अमेरिकी रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी (DSCA) और पेंटागन द्वारा जारी आधिकारिक विवरण के अनुसार, इस रणनीतिक सौदे में भारतीय सेना की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए अत्याधुनिक मिसाइल राउंड्स और ग्राउंड सपोर्ट सिस्टम का पूरा पैकेज शामिल किया गया है:
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100+ एफजीएम-148 जेवलिन राउंड्स: 100 ऑपरेशनल मिसाइल राउंड्स के साथ-साथ परीक्षण एवं मूल्यांकन (Fly-to-Buy Evaluation) के लिए अतिरिक्त मिसाइलें।
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25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट्स (LwCLU / Block 1 CLUs): यह अगली पीढ़ी का आधुनिक लॉन्चिंग सिस्टम है, जो दिन और रात दोनों समय थर्मल इमेजिंग के जरिए कई किलोमीटर दूर छिपे दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों की सटीक पहचान करता है।
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ट्रेनिंग और सिमुलेशन उपकरण: भारतीय जवानों को मिसाइल संचालन में पारंगत बनाने के लिए बेसिक स्किल्स ट्रेनर्स (BST), मिसाइल सिमुलेशन राउंड्स और बैटरी कूलेंट यूनिट्स (BCU)।
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लाइफसाइकिल सपोर्ट और स्पेयर पार्ट्स: मिसाइल सिस्टम के लंबे समय तक रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, इंटरेक्टिव इलेक्ट्रॉनिक टेक्निकल मैनुअल्स और सिस्टम इंटीग्रेशन टेस्टिंग की पूरी व्यवस्था।
जेवलिन मिसाइल का निर्माण अमेरिकी रक्षा दिग्गज लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin) और आरटीएक्स (RTX – Raytheon) का संयुक्त उपक्रम ‘जेवलिन जॉइंट वेंचर’ (JJV) करता है। इसकी तकनीकी खासियतें इसे पारंपरिक एंटी-टैंक मिसाइलों से कई गुना बेहतर बनाती हैं:
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फायर एंड फॉरगेट (Fire-and-Forget) तकनीक: पुरानी पीढ़ी की वायर-गाइडेड या लेजर-गाइडेड मिसाइलों को दागने के बाद ऑपरेटर को मिसाइल के निशाने पर पहुंचने तक लगातार एक ही जगह खड़े होकर दिशा दिखानी पड़ती थी, जिससे दुश्मन के पलटवार का भारी जोखिम रहता था। जेवलिन में ऑपरेटर लक्ष्य पर कर्सर लॉक करके मिसाइल दागते ही तुरंत सुरक्षित स्थान पर छिप सकता है या अपनी स्थिति बदल सकता है। मिसाइल का अत्याधुनिक इन्फ्रारेड सीकर खुद ब खुद टैंक का पीछा करता है।
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टॉप-अटैक (Top-Attack) क्षमता: किसी भी युद्धक टैंक की सबसे कमजोर परत उसकी छत (Top Armor) होती है, जबकि उसका अगला और साइड का हिस्सा भारी आर्मर प्लेटों से सुरक्षित रहता है। जेवलिन मिसाइल लॉन्च होने के बाद आसमान में ऊपर उठती है (Arched Profile) और सीधे ऊपर से 90 डिग्री के कोण पर टैंक के सबसे कमजोर हिस्से पर गिरती है, जिससे कोई भी एडवांस टैंक बच नहीं पाता।
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डायरेक्ट-अटैक (Direct Attack) मोड: इसका इस्तेमाल बंकरों, इमारतों, खड़े हेलीकॉप्टरों और हल्के बख्तरबंद वाहनों को सीधे प्रहार से नष्ट करने के लिए किया जाता है।
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सॉफ्ट-लॉन्च (Soft-Launch) तकनीक: जेवलिन का इजेक्शन मोटर मिसाइल को बिना तेज आग या बैकब्लास्ट के ट्यूब से बाहर निकालता है, और मुख्य रॉकेट मोटर सुरक्षित दूरी पर पहुंचने के बाद स्टार्ट होता है। इस वजह से इसे बंद कमरों, बंकरों या संकरी जगहों से भी बिना किसी खतरे के दागा जा सकता है।
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सिंगल मैन पोर्टेबल: पूरा सिस्टम हल्का (लगभग 15.9 किग्रा से 22 किग्रा कुल पैकेज) है, जिसे पैदल सेना का एक अकेला जवान अपने कंधे पर उठाकर ऊंचे पहाड़ों और संकरी घाटियों में आसानी से ले जा सकता है। इसकी प्रभावी मारक क्षमता लगभग 2.5 से 4 किलोमीटर तक है।
चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पिछले कुछ वर्षों में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने भारी मात्रा में हल्के टैंक (Type 15 ‘Black Panther’ Tanks), इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स और बख्तरबंद गाड़ियां तैनात की हैं। लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के 14,000 से 18,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में भारी टैंकों को तेजी से मूव कराना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
ऐसी दुर्गम चोटियों और संकरे दर्रों पर भारतीय सेना की पैदल टुकड़ियों के पास जेवलिन जैसी हल्की और कंधे से दागी जाने वाली घातक मिसाइल का होना एक निर्णायक रणनीतिक बढ़त प्रदान करता है। जेवलिन का थर्मल सेंसर लद्दाख के शून्य से नीचे के तापमान और धुंध में भी दुश्मन के टैंकों के इंजन से निकलने वाली गर्मी को आसानी से पकड़ लेता है। यह किसी भी अचानक होने वाले चीनी बख्तरबंद हमले को घाटियों के मुहाने पर ही रोक देने में पूरी तरह सक्षम है।
वर्तमान 45.7 मिलियन डॉलर की डील भारतीय सेना की तत्काल सामरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक आपातकालीन खरीद (Emergency Acquisition) के रूप में देखी जा रही है। हालांकि, भारत और अमेरिका के बीच इससे भी बड़ी बातचीत जेवलिन सिस्टम के घरेलू विनिर्माण (Domestic Manufacturing) को लेकर चल रही है।
भारत की सरकारी रक्षा पीएसयू भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) और अमेरिकी जेवलिन जॉइंट वेंचर (JJV) के बीच भारत में इसके उत्पादन को लेकर प्रारंभिक समझौता पहले ही हो चुका है। यदि यह सह-उत्पादन समझौता अंतिम रूप लेता है, तो भारतीय रक्षा उद्योग को न केवल आधुनिक मिसाइल तकनीक का अनुभव मिलेगा, बल्कि भारतीय सशस्त्र बलों की भविष्य की हजारों मिसाइलों की मांग भारत की अपनी फैक्ट्रियों से ही पूरी हो सकेगी।
भारत द्वारा जेवलिन मिसाइल हासिल करने की योजना का इतिहास डेढ़ दशक पुराना है। साल 2010 में पहली बार इस खरीद का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) की शर्तों और इजरायल के ‘स्पाइक’ (Spike) मिसाइल सिस्टम तथा भारत के स्वदेशी ‘मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल’ (MPATGM) प्रोजेक्ट के विकल्पों के चलते यह फैसला लंबित रहा।
अब इस औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर होना यह दर्शाता है कि भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साझेदारी एक बेहद परिपक्व और रणनीतिक स्तर पर पहुंच चुकी है। अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, चिनूक हैवी-लिफ्ट हेलीकॉप्टर, पी-8आई समुद्री निगरानी विमान, सी-17 ग्लोबमास्टर और एम777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर के बाद अब जेवलिन मिसाइल का भारतीय सेना में शामिल होना थल सेना की आक्रामक और रक्षात्मक मारक क्षमता को कई गुना मजबूत करेगा।
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